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कठपुतली कलां में झलकती है भारतीय संस्कृति की झलक
Updated Tue, 20 Mar 2018 11:28 PM IST
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रुड़की। कठपुतली कला में एक ओर जहां भारतीय संस्कृति की झलक झलकती है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों कठपुतली कला से शिक्षा में नए आयाम स्थापित कर रहे है। मेहवड़ कलां के स्कूल में तैनात शिक्षक संजय वत्स राजस्थान के उदयपुर में प्रशिक्षण लेने के बाद यह काम कर रहे है।
हर साल 21 मार्च को कठपुतली मनाया जाता है। राजकीय प्राथमिक विद्यालय बेड़पुर में तैनात शिक्षक संजय वत्स ने बताया कि उन्होंने 2014-15 में उदयपुर राजस्थान में प्रशिक्षण लिया था। उन्होंने बताया कि कठपुतली कलाओं के द्वारा किसी भी विषय को नाटकीय रूप दिया जा सकता है। उसकी सामान्य प्रक्रिया के तहत की गई पढ़ाई से ज्यादा स्थायी समझ बढ़ती है। वह समय-समय पर स्कूल के बच्चों को कठपुतली कला के द्वारा पढ़ाने में ज्यादा विषय रखते है। उन्होंने बताया कि स्कूल के बच्चे समय-समय पर नुक्कड़ नाटक, कठपुतली नाटक आदि से लोगों को शिक्षा, बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ और प्रौढ़ शिक्षा एवं पल्स पोलियो को लेकर जागरूकता करते है। कठपुतली कलां की सबसे खास बात यह है कि इसमें कई कलाओं मिश्रण है। इसमें लेखन कलां, नाट्य कला, चित्रकला, मूर्तिकला, काष्ठकला, वस्त्र निर्माण कला, रूप सज्जा, संगीत नृत्य जैसी कई कलाओं का इस्तेमाल होता है। इसके साथ ही बेजान होने के बाद भी ये कठपुतलियां जिस समय अपनी पूरी साज सज्जा के साथ मंच पर उपस्थित होती हैं, तो दर्शक पूरी तरह उनके साथ बंध जाता है।
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हर साल 21 मार्च को कठपुतली मनाया जाता है। राजकीय प्राथमिक विद्यालय बेड़पुर में तैनात शिक्षक संजय वत्स ने बताया कि उन्होंने 2014-15 में उदयपुर राजस्थान में प्रशिक्षण लिया था। उन्होंने बताया कि कठपुतली कलाओं के द्वारा किसी भी विषय को नाटकीय रूप दिया जा सकता है। उसकी सामान्य प्रक्रिया के तहत की गई पढ़ाई से ज्यादा स्थायी समझ बढ़ती है। वह समय-समय पर स्कूल के बच्चों को कठपुतली कला के द्वारा पढ़ाने में ज्यादा विषय रखते है। उन्होंने बताया कि स्कूल के बच्चे समय-समय पर नुक्कड़ नाटक, कठपुतली नाटक आदि से लोगों को शिक्षा, बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ और प्रौढ़ शिक्षा एवं पल्स पोलियो को लेकर जागरूकता करते है। कठपुतली कलां की सबसे खास बात यह है कि इसमें कई कलाओं मिश्रण है। इसमें लेखन कलां, नाट्य कला, चित्रकला, मूर्तिकला, काष्ठकला, वस्त्र निर्माण कला, रूप सज्जा, संगीत नृत्य जैसी कई कलाओं का इस्तेमाल होता है। इसके साथ ही बेजान होने के बाद भी ये कठपुतलियां जिस समय अपनी पूरी साज सज्जा के साथ मंच पर उपस्थित होती हैं, तो दर्शक पूरी तरह उनके साथ बंध जाता है।
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