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बांध पीड़ितों की उम्मीदों पर फिरा पानी

Mon, 01 Aug 2016 02:30 AM IST
गंगादत्त थपलियाल /अमर उजाला, ऋषिकेश
गंगादत्त थपलियाल /अमर उजाला, ऋषिकेश Updated Mon, 01 Aug 2016 02:30 AM IST
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The victims went to the expectations of the dam water
टिहरी विस्‍थ्‍ापित - फोटो : अमर उजाला

टिहरी बांध के लिए पुरखों की संजोयी विरासत को समाधि देने वाले विस्थापित परिवारों की उम्मीदों पर एक बार फिर पानी फिर गया है। भेड़ एवं ऊन प्रसार संस्थान ट्रेनिंग सेंटर का अस्तित्व खत्म होने का तर्क देकर पुनर्वास के लिए 35 एकड़ जमीन देने से हाथ खड़े कर लिये हैं।

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बता दें कि बांध बनने के वर्षों बाद आज तक लोग उसका दंश झेल रहे हैं। टिहरी बांध प्रभावित नंद गांव, पिपोलाखास, रौलकोट, भट कंडा, गडोली, सरोट और डोबन के 415 परिवार वर्षों से पुनर्वास के लिए आंदोलनरत हैं। बीते 24 जून को पशुपालन और शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार की अध्यक्षता में हुई उप मंत्री मंडल समिति की बैठक में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को ऋषिकेश आईडीपीएल, पशुलोक, दूध पानी, जाखन भानियावाला में भूूमि का प्रस्ताव एक सप्ताह में भारत सरकार को भेजने का निर्णय लिया गया था।
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इसी क्रम मेें पशुपालन निदेशक ने पशुलोक स्थित भेड़ एवं ऊन प्रसार संस्थान के निदेशक को टिहरी बांध प्रभावितों के पुनर्वास को 35 एकड़  भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भेजा था। संस्थान के परियोजना निदेशक डा. एसके शर्मा ने सात जुलाई को शासन को प्रेषित पत्र में कहा है कि उक्त 35 एकड भूमि पर डेरी अनुभाग है। जिसमें सौ पशु है। इसके अलावा वहां पर पशुधन प्रसार अधिकारियों का ट्रेनिंग सेंटर है। जिसमें प्रति वर्ष 100 पशुधन प्रसार अधिकारी प्रशिक्षण लेते है।
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पशुओं के लिए चारा का उत्पादन भी यही पर किया जाता है। वर्ष 2000 में विभाग पुनर्वास विभाग को 680 एकड और एम्स ऋषिकेश को 2004 में 107 एकड़ भूमि दे चुका है। यदि इसी तरह विभाग भूमि देता रहा तो पशुलोक का ही अस्तित्व खत्म हो जाएगा। उन्होंने शासन को सुझाव दिया है कि प्रभावित परिवारों का पुनर्वास खाली पड़ी वन भूमि क्षेत्र में किया जा सकता है।

ऐसे हुई थी पशुलोक की स्थापना
महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन ने 1954 में पशुलोक की स्थापना की थी। जिसमें उन्होंने गो सेवा और चिकित्सा शुरू की गई थी। पशु-पक्षियों के बीच में जाकर बसने और सेवा कार्य करने के अपने विचारों के अनुरूप किसी ऐसे क्षेत्र का निर्माण करना चाहती थी। जिसमें सर्वांगीण विकास हो सके। इसी उद्देश्य को लेकर मीरा बेन ने पशुलोक की स्थापना की थी। लेकिन आज यह संस्थान अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रहा है। पशुलोक की इस बहु उपयोगी भूमि पर सत्ताधीशों की गिद्ध दृष्टि पड़ी हुई है। मानवीय बसावट के लिए पशुलोक की भूमि को कई बार उपयोग में लाया गया है। 1954 में मीरा बेन ने पशुलोक को 21 46 एकड़ भूमि दी थी। जो अब सिमट कर 1359 एकड़ रह गई है।

 कोट.....
टिहरी बांध प्रभावितों के पुनर्वास को आईडीपीएल, पशुलोक, दूध पानी, जाखन भानियावाला में भूमि की तलाश की जा रही है। जाखन नदी किनारे वन भूमि का प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा गया है। पशुलोक में भूमि न देने संबंधी निर्णय की जानकारी नहीं है।

डीके सिंह, ईई पुनर्वास विभाग टिहरी

झील के समीपवर्ती गांवों में झील का जल स्तर बढने से लगातार भूस्खलन हो रहा है। पुनर्वास विभाग और टीएचडीसी प्रभावितों के पुनर्वास के लिए भ्ूामि अधिग्रहण को लेकर गुमराह कर रही है। कभी पशुलोक तो कभी पत्थरी में भूमि तलाशने की बात कहकर विभागीय अधिकारियों प्रभावितों का फुटबाल बना दिया है।
सोहन सिंह राणा, अध्यक्ष आंशिक डूब क्षेत्र संघर्ष समिति

 

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