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Rishikesh News: कभी घर- घर बंटती थी मिठास अब दर- दर पर पसरा है सन्नाटा

Fri, 06 Nov 2026 08:41 PM IST
देहरादून ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश
संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश Updated Fri, 06 Nov 2026 08:41 PM IST
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Once, sweetness was distributed from house to house, but now silence prevails everywhere
कभी एक-दूसरे के घर बंटती थीं पकौड़ी-मिठाई, अब बुजुर्ग ही ताकते रह जाते हैं राह
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विकासखंड के 2 दर्जन से अधिक गांवों में हुआ 80 प्रतिशत से अधिक स्थाई पलायन
पलायन ने गांव किए सूने, दिवाली की रौनक और अपनापन भी हुआ गायब
कभी घर- घर बंटती थी मिठास अब दर- दर पर पसरा है सन्नाटा
यमकेश्वर। कभी दिवाली जैसे त्योहारों में यमकेश्वर के गांवों में अलग ही रौनक रहती थी। नौकरी-पेशा लोग परिवार संग दिवाली मनाने गांव लौट आते थे। घर-आंगन तेल के दीयों से जगमगा उठते थे, पूरे गांव में खुशियों की गूंज होती थी लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब त्योहारों पर भी प्रवासी गांव नहीं लौटते। पलायन ने गांवों को सूना कर दिया है। विकासखंड में अधिकांश पलायन ग्रस्त गांवों में अब गिनती के एकल परिवार ही रह गए हैं। अधिकांश परिवार स्थायी रूप से पलायन कर गए हैं। जो बचे हैं, उनमें भी ज्यादातर बुजुर्ग ही हैं। दीपावली पर अब वह घर के दरवाजे पर बैठकर अपने बच्चों और नाती-पोतों की राह ताकते रह जाते हैं, लेकिन राह ताकते-ताकते ही त्योहार गुजर जाता है। कई घरों में दशकों से ताले लटके हुए हैं। कंडवालगांव, सिंदूड़ी, पैन्या, भेलडूंगा, ईडिया के बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि दीपावली पर गांव में अपनापन देखने लायक होता था। गांव में एक-दूसरे के घरों में स्वाल, पकौड़ी, मिष्ठान बांटे जाते थे। जिन लोगों के घर में दिवाली नहीं होती थी, उन्हें विशेष रूप से पकौड़ी, स्वाल और मिठाई दी जाती थी। कोई भी घर ऐसा नहीं होता था, जहां त्योहार की मिठास न पहुंचती हो।

दिवाली में सिर्फ इंसानों की नहीं, पशुओं की भी होती थी। ग्रामीण बड़े उत्साह के साथ दीपावली के दिन अपने पालतू पशुओं की पूजा करके फूल माला पहनाते थे। पूजा के बाद उन्हें भात और झंगोरा खिलाने का रिवाज था। इसके बाद पशुओं को सजा-धजाकर चराने के लिए जंगल ले जाया जाता था। पूरा गांव इस आयोजन में शामिल होता था। बच्चे-बूढ़े सब इस खुशी में डूबे रहते थे। अब गिने चुने गांवों में ही रौनक रहती है।
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