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शालीनता का पर्याय है हिन्दू संस्कार : बजरंग मुनि
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- फोटो : डेमो
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ब्यूरो/अमर उजाला/ऋषिकेश।
यदि किसी धर्म का स्वरूप संस्थागत हो तो कोई समस्या नहीं होत। जब धर्म संगठन का रूप ग्रहण कर लेता है तब उसमें संख्यात्मक विस्तार की छीना झपटी शुरू हो जाती है। यह छीना झपटी ही घातक हो जाती है। जब तक हिन्दू धर्म संगठनात्मक स्वरूप से दूर रहा तब तक कोई टकराव नहीं आया। हिन्दू संस्कार गुलामी सह सकता है, लेकिन गुलाम बना नहीं सकता। अत्याचार सह सकता है, लेकिन कर नहीं सकता। वास्तव में हिन्दू संस्कार शालीनता का पर्याय है।
यह बात बजरंग मुनि ने रविवार को देहरादून रोड स्थित बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान में साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ कार्यक्रम में कहीं। धर्म परिवर्तन कितनी स्वतंत्रता-कितना अपराध विषय पर गोष्ठी आयोजित में बजरंग मुनि ने कहा कि धर्म शब्द प्राचीन समय में गुण प्रधान रहा है। धर्म स्वयं एकवचन है बहुवचन नहीं। जब भारत गुलाम हुआ तब भारत में पहचान प्रधान शब्द धर्म के साथ जुड़ गया और धर्म शब्द द्विअर्थी हो गया। यही कारण है कि भारतीय व्यवस्था में धर्म परिवर्तन की कोई चर्चा नहीं हुई क्योंकि पहचान प्रधान धर्म तो बदल सकता है किन्तु गुण प्रधान नहीं। उन्होंने कहा कि दुनियां में जितनी हत्याएं और अत्याचार हुए हैं उनमें सबसे ज्यादा अत्याचार धार्मिक टकराव के कारण हुए। इस अवसर पर योगाचार्य अंकित नैथानी, प्रमोद कुमार वात्सल्य, टीकाराम देवरानी, ऊषा रावत, प्रियंका डिमरी, अनुसूया प्रसाद बिजल्वाण, कमल सिंह राणा, केके पांडेय, दीपक दरगन, डॉ. सोम वैद्य, एचएल ब्रेजा, योगाचार्य विजय पैन्यूली, वीरेंद्र ममगाईं, संकित सेमवाल, आशीष गोयल, मंगल प्रसाद, अरविंद तिवारी आदि उपस्थित रहे।
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यदि किसी धर्म का स्वरूप संस्थागत हो तो कोई समस्या नहीं होत। जब धर्म संगठन का रूप ग्रहण कर लेता है तब उसमें संख्यात्मक विस्तार की छीना झपटी शुरू हो जाती है। यह छीना झपटी ही घातक हो जाती है। जब तक हिन्दू धर्म संगठनात्मक स्वरूप से दूर रहा तब तक कोई टकराव नहीं आया। हिन्दू संस्कार गुलामी सह सकता है, लेकिन गुलाम बना नहीं सकता। अत्याचार सह सकता है, लेकिन कर नहीं सकता। वास्तव में हिन्दू संस्कार शालीनता का पर्याय है।
यह बात बजरंग मुनि ने रविवार को देहरादून रोड स्थित बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान में साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ कार्यक्रम में कहीं। धर्म परिवर्तन कितनी स्वतंत्रता-कितना अपराध विषय पर गोष्ठी आयोजित में बजरंग मुनि ने कहा कि धर्म शब्द प्राचीन समय में गुण प्रधान रहा है। धर्म स्वयं एकवचन है बहुवचन नहीं। जब भारत गुलाम हुआ तब भारत में पहचान प्रधान शब्द धर्म के साथ जुड़ गया और धर्म शब्द द्विअर्थी हो गया। यही कारण है कि भारतीय व्यवस्था में धर्म परिवर्तन की कोई चर्चा नहीं हुई क्योंकि पहचान प्रधान धर्म तो बदल सकता है किन्तु गुण प्रधान नहीं। उन्होंने कहा कि दुनियां में जितनी हत्याएं और अत्याचार हुए हैं उनमें सबसे ज्यादा अत्याचार धार्मिक टकराव के कारण हुए। इस अवसर पर योगाचार्य अंकित नैथानी, प्रमोद कुमार वात्सल्य, टीकाराम देवरानी, ऊषा रावत, प्रियंका डिमरी, अनुसूया प्रसाद बिजल्वाण, कमल सिंह राणा, केके पांडेय, दीपक दरगन, डॉ. सोम वैद्य, एचएल ब्रेजा, योगाचार्य विजय पैन्यूली, वीरेंद्र ममगाईं, संकित सेमवाल, आशीष गोयल, मंगल प्रसाद, अरविंद तिवारी आदि उपस्थित रहे।
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