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खेतों की अधिक जुताई से 'सूख' रही उपजाऊ जमीन
हसीन खान/ अमर उजाला, पंतनगर
Updated Thu, 21 Apr 2016 01:35 PM IST
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- फोटो : amar ujala
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खेतों में जुताई ज्यादा करने, जैविक खादों के कम इस्तेमाल और बढ़ते तापमान के कारण जमीन में पानी रोकने की क्षमता कम हो रही है।
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अधिक जुताई से जीवाश्म अर्थात आर्गेनिक तत्वों का ह्रास हो रहा है। तापमान बढ़ने से पानी का वाष्पीकरण होकर वह वायुमंडल में उड़ जाता है। जमीन में पानी न रुकने की वजह से किसान को सिंचाई के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
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आर्गेनिक या कार्बनिक तत्व जमीन में पानी रोकने की क्षमता रखते हैं। ट्रेक्टर और हैरो से लगातार कई जुताइयां करने से जमीन के कार्बनिक तत्व खत्म हो रहे हैं। इस कारण जमीन में पानी रोकने की क्षमता घट रही है। अधिक उपज के लालच में किसान रासायनिक खादों का असुंतलित उपयोग करते हैं। इससे भूमि में पानी रोकने की क्षमता कम हुई है और उर्वरा शक्ति भी घटी है। किसानों को खेती के लिए हरी, कंपोस्ट और अन्य जैविक खादों का उपयोग करना चाहिए।
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जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संयुक्त निदेशक शोध डा. रमेश चंद्रा का कहना है कि उत्तराखंड में जीवाष्म दशमलव छह से सात, यूपी में दशमलव 5 और पंजाब में दशमलव 2 रिकार्ड किया गया है।
उन्होंने बताया कि पानी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए जमीन को रिचार्ज करने के लिए खेतों के किनारे छोटे छोटे तालाबनुमा गड्ढे बनाए जाएं। इनमें बरसात के पानी को रोका जाए। यह व्यवस्था ढलान वाले खेतों में अवश्य ही की जाए। खेतों की मेढ़बंदी की जाए। मेड़ों पर घास लगाई जाए ताकि मेढ़ें क्षतिग्रस्त न हों।
कटाई के बाद खेतों में बचने वाले फसल अवशेष जीवाष्म बढ़ाने में मदद करते हैं। इसलिए फसलों के अवशेष को रिसाइकिल किया जाए। वाष्पीकरण रोकने के लिए खेती में मल्चिंग प्रक्रिया अपनाई जाए। मल्चिंग से फसल कवर्ड रहेगी। चौड़ी पत्ती वाली फसलों खासकर दलहनी फसलों और सब्जियों की खेती की जाए।
- डा. रमेश चंद्रा, संयुक्त निदेशक शोध, पंतनगर