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लड़ाई खत्म होने के लिए करती थी प्रार्थना
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चंद्रा देवी शहीद नायब सूबेदार शिव सिंह की पत्नी।
- फोटो : PITHORAGARH
पिथौरागढ़। वर्ष 1971 की लड़ाई में शहीद हुए 17 कुमाऊं के नायब सूबेदार शिव सिंह की वीरांगना चंद्रा देवी (77) स्वर्णिम विजय मशाल के स्वागत के लिए युद्ध स्मारक स्थल पर पहुंचीं थीं। सहारे के बिना वह चल नहीं सकतीं हैं। इसके बावजूद 1971 में स्वर्णिम विजय मशाल की झलक पाने के लिए वह पोते अक्षय सिंह ज्याला के साथ पहुंचीं थीं। युद्ध स्मारक स्थल पर स्वर्णिम मशाल की ज्योत ने उन्हें पति की शहादत याद दिला दी।
पति की शहादत के बारे में जब उनसे बातचीत की गई तो उनकी आंखों में आंसू नहीं, गर्व दिखाई दिया। उन्होंने बताया कि जब उन्हें लड़ाई शुरू होने की सूचना मिली तो वह घबरा गईं थीं। वह रोज पति की सलामती के साथ ही लड़ाई खत्म होने की प्रार्थना करतीं रहती थीं लेकिन मन में डर रहता था कि कब, कौन सी सूचना आ जाए लेकिन एक दिन पति के शहीद होने की खबर आ ही गई। महज 26 साल की उम्र में पति शहीद हो गए। तब वीरांगना की उम्र मात्र 23 साल थी। शिव सिंह 1959 में सेना में भर्ती हुए थे। ठीक 11 साल बाद 1971 में वह लड़ाई में शहीद हो गए थे।
चंद्रा बताती हैं कि पति की शहादत के समय चार साल की एक बेटी और छह माह का बेटा राजेश सिंह ज्याला था। पति की शहादत के बाद ऐसा लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो। दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उन पर थी। किसी तरह स्वयं को संभालकर बच्चों को पाला। उन्होंने गर्व से कहा कि देश के लिए पति ने जो शहादत दी, वह सीमांत के इतिहास की गाथा का स्वर्णिम युग बन गया है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी भी देश रक्षा के लिए आगे आए। उनके पोते अक्षय सिंह ज्याला ने बताया कि उनके परदादा मान सिंह भी कुमाऊं रेजिमेंट के सिपाही थे। पोते अक्षय को भी गर्व है कि उनके दादा ने देश के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया। चंद्रा अपने परिवार के साथ कुमौड़ में रहतीं हैं।
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पति की शहादत के बारे में जब उनसे बातचीत की गई तो उनकी आंखों में आंसू नहीं, गर्व दिखाई दिया। उन्होंने बताया कि जब उन्हें लड़ाई शुरू होने की सूचना मिली तो वह घबरा गईं थीं। वह रोज पति की सलामती के साथ ही लड़ाई खत्म होने की प्रार्थना करतीं रहती थीं लेकिन मन में डर रहता था कि कब, कौन सी सूचना आ जाए लेकिन एक दिन पति के शहीद होने की खबर आ ही गई। महज 26 साल की उम्र में पति शहीद हो गए। तब वीरांगना की उम्र मात्र 23 साल थी। शिव सिंह 1959 में सेना में भर्ती हुए थे। ठीक 11 साल बाद 1971 में वह लड़ाई में शहीद हो गए थे।
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चंद्रा बताती हैं कि पति की शहादत के समय चार साल की एक बेटी और छह माह का बेटा राजेश सिंह ज्याला था। पति की शहादत के बाद ऐसा लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो। दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उन पर थी। किसी तरह स्वयं को संभालकर बच्चों को पाला। उन्होंने गर्व से कहा कि देश के लिए पति ने जो शहादत दी, वह सीमांत के इतिहास की गाथा का स्वर्णिम युग बन गया है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी भी देश रक्षा के लिए आगे आए। उनके पोते अक्षय सिंह ज्याला ने बताया कि उनके परदादा मान सिंह भी कुमाऊं रेजिमेंट के सिपाही थे। पोते अक्षय को भी गर्व है कि उनके दादा ने देश के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया। चंद्रा अपने परिवार के साथ कुमौड़ में रहतीं हैं।
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