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गांवों में अब भी ओखल में तैयार किए जाते हैं च्यूड़े

Fri, 20 Oct 2017 10:12 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
ब्यूरो/अमर उजाला, थल Updated Fri, 20 Oct 2017 10:12 PM IST
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The villages are still made ready in Okhal.
थल के गोल गांव में भैयादूज के लिए च्यूड़े तैयार करतीं महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

वैसे तो पहाड़ के गांव लगातार खाली होते जा रहे हैं। शहरों में न तो धान पैदा होता है और न धान कूटने के लिए ओखल की ही जरूरत है। छोटे कस्बों में भी धान कूटने वाली मशीनें लग चुकी है, लेकिन दिवाली के समय भैयादूज के लिए तैयार किए जाने वाले च्यूड़े का महत्व ओखल में कूटने से ही कायम रहता है।

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दिवाली से ठीक पहले एकादशी के दिन एक बर्तन में धान भिगो दिए जाते हैं और दिवाली के अगले दिन यानि कि अन्नकूट प्रतिपदा के दिन इन धानों को पहले एक बर्तन में भूना जाता है और भूने हुए धानों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ओखल में डाला जाता है। कूटने के बाद इनसे चिपके हुए और स्वादिष्ट चावल (च्यूड़े) निकलते हैं। इन च्यूड़ों से ही भैयादूज के दिन बहनें अपने भाइयों के सिर का पूजन करेंगे।
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अभी अधिकांश गांवों में च्यूड़े तैयार करते समय सामूहिकता देखनी को मिलती है। थल के गोल गांव में शुक्रवार सुबह आठ बजे से ही च्यूड़े तैयार करने का कार्यक्रम शुरू हो गया। इस काम में एक-दूसरे की मदद की जाती है। इससे काम जल्दी से निपट जाता है। गोल गांव में गीता चंद के घर के पास ओखल बना है। एक महिला च्यूड़े भूनने के काम में लग गई, दो महिलाएं एक साथ च्यूड़ों को कूटने में जुटी रही। तैयार च्यूड़ों को शनिवार सुबह सबसे पहले मंदिर में चढ़ाया जाएगा। उसके बाद बहनें अपने भाइयों के सिर का पूजन करेंगी। च्यूड़े तैयार करते समय कमला देवी, चंद्रा देवी, पुष्पा देवी, गीता कार्की मौजूद रहीं। अन्य गांवों में भी इसी तरह च्यूड़े बनाने का काम जारी रहा।
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ओखल में तैयार च्यूड़े पवित्र होते हैं
पिथौरागढ़। पंडित आनंद बल्लभ जोशी का कहना है कि बाजार में भी मशीन से तैयार च्यूड़े मिल जाते हैं, लेकिन ओखल में तैयार च्यूड़े पवित्र होते हैं। इनको मंदिर में चढ़ाया जा सकता है और खाने में भी स्वादिष्ट होते हैं। लंबे समय तक च्यूड़े घर पर रखे जाएं तो खराब नहीं होते। पहले शहरों में नौकरी करने वालों के लिए भी च्यूड़े भेजे जाते थे। यह पौष्टिक भी होते हैं।

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