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Pithoragarh News: जल की रानी पंगास और वियतनामी मछली बदलेगी तकदीर
Thu, 20 Feb 2025 11:21 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Thu, 20 Feb 2025 11:21 PM IST
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पिथौरागढ़। पंगास और वियतनामी मछली सीमांत के लोगों की तकदीर बदलेगी। मत्स्य विभाग की ओर से किए गए ट्रायल में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। बॉयो फ्लॉक और आरएएस तकनीक से कैटफिश की इन प्रजातियों का उत्पादन जिले में होगा।
मत्स्य विभाग ने बॉयो फ्लॉक और आरएएस तकनीक से कैटफिश प्रजाति की पंगास, वियतनामी कोई और वियतनामी मोलर मछली पालन की सीमांत जिले में पहल शुरू की है। 10 किसानों का चयन कर जिला मुख्यालय में इनका पालन शुरू कर दिया है।
इन मछली उत्पादकों ने पहली बार दस लाख रुपये खर्च कर बॉयो फ्लाॅक तकनीक से पांच क्विंटल और 25,00,000 रुपये खर्च कर आरएएस तकनीक से 10 क्विंटल कैटफिश का उत्पादन किया। 300 रुपये प्रति किलो कैटफिश बेचकर किसानों ने एक साल में 4,50,000 रुपये की कमाई की।
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घाटी वाले इलाकों में ही उत्पादन संभव
जिला मत्स्य अधिकारी डॉ. रमेश चलाल का कहना है कि कैटफिश का बेहद कम पानी में भी पालन हो सकता है, लेकिन ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान इसमें बाधक बन सकता है। ऐसा इसलिए कि कैटफिश के लिए 24 से 29 डिग्री तापमान जरूरी है। ऐसे में इस प्रजाति का उत्पादन जिला मुख्यालय के साथ ही घाटी वाले इलाकों में ही संभव है।
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यह है बॉयो फ्लाॅक तकनीक
- बॉयो फ्लॉक एक बैक्टीरिया है जो कैटफिश के मल को प्रोटीन में बदलता है। इसी मल को कैटफिश अपने भोजन के लिए उपयोग में लाती है और इसका तेजी से विकास होता है। इससे कैटफिश के पालन में चारे की भी खासी बचत होती है।
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यह है आरएएस तकनीक
- आरएएस (रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम) ऐसी ही एक तकनीक है, जिसमें एक टैंक में मछली पालन किया जाता है। इस तकनीक की खासियत यह है कि मछली पालन में दूषित हुए पानी को बॉयो फिल्टर टैंक में डाला जाता है। फिर इसे फिल्टर करके वापस मछली वाले टैंक में भेज दिया जाता है। इससे पानी की बर्बादी नहीं होती।
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मत्स्य विभाग ने बॉयो फ्लॉक और आरएएस तकनीक से कैटफिश प्रजाति की पंगास, वियतनामी कोई और वियतनामी मोलर मछली पालन की सीमांत जिले में पहल शुरू की है। 10 किसानों का चयन कर जिला मुख्यालय में इनका पालन शुरू कर दिया है।
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इन मछली उत्पादकों ने पहली बार दस लाख रुपये खर्च कर बॉयो फ्लाॅक तकनीक से पांच क्विंटल और 25,00,000 रुपये खर्च कर आरएएस तकनीक से 10 क्विंटल कैटफिश का उत्पादन किया। 300 रुपये प्रति किलो कैटफिश बेचकर किसानों ने एक साल में 4,50,000 रुपये की कमाई की।
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घाटी वाले इलाकों में ही उत्पादन संभव
जिला मत्स्य अधिकारी डॉ. रमेश चलाल का कहना है कि कैटफिश का बेहद कम पानी में भी पालन हो सकता है, लेकिन ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान इसमें बाधक बन सकता है। ऐसा इसलिए कि कैटफिश के लिए 24 से 29 डिग्री तापमान जरूरी है। ऐसे में इस प्रजाति का उत्पादन जिला मुख्यालय के साथ ही घाटी वाले इलाकों में ही संभव है।
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यह है बॉयो फ्लाॅक तकनीक
- बॉयो फ्लॉक एक बैक्टीरिया है जो कैटफिश के मल को प्रोटीन में बदलता है। इसी मल को कैटफिश अपने भोजन के लिए उपयोग में लाती है और इसका तेजी से विकास होता है। इससे कैटफिश के पालन में चारे की भी खासी बचत होती है।
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यह है आरएएस तकनीक
- आरएएस (रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम) ऐसी ही एक तकनीक है, जिसमें एक टैंक में मछली पालन किया जाता है। इस तकनीक की खासियत यह है कि मछली पालन में दूषित हुए पानी को बॉयो फिल्टर टैंक में डाला जाता है। फिर इसे फिल्टर करके वापस मछली वाले टैंक में भेज दिया जाता है। इससे पानी की बर्बादी नहीं होती।