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शहीद लक्ष्मण सिंह की पत्नी बसंती को पति की शहादत पर है गर्व
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शहीद लक्ष्मण सिंह की पत्नी बसंती देवी।
- फोटो : PITHORAGARH
पिथौरागढ़। देश के लिए सीमाओं पर शहीद होने वाले सदा के लिए अमर हो जाते हैं। शहादत देने वाले कई वीरों की वीरांगनाएं ऐसी हैं, जिनका शादी के कुछ समय बाद ही सिंदूर मिट गया। ऐसी वीरांगनाओं को पति की शहादत पर गर्व तो है, लेकिन जिंदगी भर एक खालीपन टीस देता रहता है। ऐसी ही वीरांगनाओं में पिथौरागढ़ की बसंती देवी भी हैं, जिन्होंने महज 19 साल की उम्र में पति को खो दिया था।
1971 में जिन भारतीय जांबाजों ने पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया थ, उनमें पिथौरागढ़ के बिलई गांव निवासी सिपाही लक्ष्मण सिंह भी शामिल थे। 17 कुमाऊं के सिपाही लक्ष्मण सिंह की पत्नी बसंती देवी (72) को अपने पति की शहादत पर बेहद गर्व है। स्वर्णिम मशाल जब सेना के वार मेमोरियल पहुंची तो बसंती देवी पंडाल में बैठीं थीं। जब उनसे परिवार, शादी और पति की शहादत के बारे में पूछा गया तो उनके जेहन में अब हर चीज साफ नहीं थी। यहां तक कि पति की तस्वीर भी बेहद धुंधली सी उनके जेहन में उभर पाती है। उन्होंने बताया कि पहले कम उम्र में विवाह हो जाता था। 14 साल की उम्र में उनकी शादी सिपाही लक्ष्मण सिंह से हुई थी। पति की उम्र उस समय लगभग 18 वर्ष रही होगी। शादी के लगभग पांच साल में ही उनके पति 1971 की लड़ाई में शहीद हो गए।
बसंती देवी ने बताया कि जब पता चला कि पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हो गया है तो वह पल-पल रेडियो पर आने वाली खबरों को सुना करतीं थीं। मन में अजीब सा डर बना रहता था। खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रहता था। जब तक युद्ध चलता रहा, तब तक किसी चीज की परवाह नहीं थी। बस उम्मीद लगाए बैठीं थीं कि भारत युद्ध जीत जाए और पति सकुशल घर आ जाएं। करीब बीस दिन बाद उन्हें युद्ध खत्म होने की सूचना मिली। खुशी हुई कि लड़ाई खत्म होने पर अब पति घर लौटेंगे लेकिन तार से पति के शहीद होने की सूचना मिली। वह कहती हैं कि घर में कोई ऐसा भी नहीं था, जिसके कंधे पर सिर रखकर आंसू न बहाए हों। जिस उम्र में बेटियां स्कूल पढ़तीं हैं, उस उम्र में वह शहीद की वीरांगना हो गईं। बच्चे नहीं थे। सामने पहाड़ सी जिंदगी थी लेकिन खुद को संभालते हुए पति की शहादत को सलाम कर जिंदगी को आगे बढ़ाया। पचास साल पहले बिछुड़े पति की अब धुंधली सी यादें हीं उनके जेहन में हैं।
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1971 में जिन भारतीय जांबाजों ने पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया थ, उनमें पिथौरागढ़ के बिलई गांव निवासी सिपाही लक्ष्मण सिंह भी शामिल थे। 17 कुमाऊं के सिपाही लक्ष्मण सिंह की पत्नी बसंती देवी (72) को अपने पति की शहादत पर बेहद गर्व है। स्वर्णिम मशाल जब सेना के वार मेमोरियल पहुंची तो बसंती देवी पंडाल में बैठीं थीं। जब उनसे परिवार, शादी और पति की शहादत के बारे में पूछा गया तो उनके जेहन में अब हर चीज साफ नहीं थी। यहां तक कि पति की तस्वीर भी बेहद धुंधली सी उनके जेहन में उभर पाती है। उन्होंने बताया कि पहले कम उम्र में विवाह हो जाता था। 14 साल की उम्र में उनकी शादी सिपाही लक्ष्मण सिंह से हुई थी। पति की उम्र उस समय लगभग 18 वर्ष रही होगी। शादी के लगभग पांच साल में ही उनके पति 1971 की लड़ाई में शहीद हो गए।
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बसंती देवी ने बताया कि जब पता चला कि पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हो गया है तो वह पल-पल रेडियो पर आने वाली खबरों को सुना करतीं थीं। मन में अजीब सा डर बना रहता था। खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रहता था। जब तक युद्ध चलता रहा, तब तक किसी चीज की परवाह नहीं थी। बस उम्मीद लगाए बैठीं थीं कि भारत युद्ध जीत जाए और पति सकुशल घर आ जाएं। करीब बीस दिन बाद उन्हें युद्ध खत्म होने की सूचना मिली। खुशी हुई कि लड़ाई खत्म होने पर अब पति घर लौटेंगे लेकिन तार से पति के शहीद होने की सूचना मिली। वह कहती हैं कि घर में कोई ऐसा भी नहीं था, जिसके कंधे पर सिर रखकर आंसू न बहाए हों। जिस उम्र में बेटियां स्कूल पढ़तीं हैं, उस उम्र में वह शहीद की वीरांगना हो गईं। बच्चे नहीं थे। सामने पहाड़ सी जिंदगी थी लेकिन खुद को संभालते हुए पति की शहादत को सलाम कर जिंदगी को आगे बढ़ाया। पचास साल पहले बिछुड़े पति की अब धुंधली सी यादें हीं उनके जेहन में हैं।
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