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सिर्फ रंग, अबीर लगाकर खेलते हैं रं समाज वाले होली
ब्यूरा/अमर उजाला, धारचूला (पिथौरागढ़)।
Updated Thu, 17 Mar 2016 11:33 PM IST
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धारचूला (पिथौरागढ़)। दारमा, व्यास और चौदांस घाटी में रहने वाले रं समाज के लोगों में होली गायन की कोई परंपरा नहीं है। कुमाऊं के अन्य हिस्सों में पौष के प्रथम रविवार से होली का गायन होने लगता है, लेकिन रं समाज के लोग न तो कृष्ण और राम से संबंधित कोई होली गीत गाते हैं और न होली के समय प्रचलित हंसी, ठिठोली वाले गीतों को ही जानते हैं। तीनों घाटियों में कहीं पर भी होली की चीर का बंधन नहीं होता, जबकि कुमाऊं के अन्य स्थानों पर होलाष्टक और रंगभरनी एकादशी के दिन चीर बंधन कर दिया जाता है।
कुमाऊं के अन्य हिस्सों में महिलाएं और पुरुष समान रूप से होली का गायन करते हैं। होली की परंपरा का यहां तक न पहुंच पाने के पीछे कारण बताया जाता है कि रं समाज के लोग अपनी बोली और संस्कृति के कारण कुमाऊं के अन्य लोगों के साथ नहीं मिल पाए। इस कारण होली के समय प्रचलित साहित्य से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता ही नहीं रहा। यहां तक कि होली की मूल परंपरा के बारे में भी रं समाज के लोग बहुत ज्यादा कुछ नहीं जानते।
रं साहित्य में होली गीतों के लिए कोई स्थान नहीं है। अब धीरे-धीरे लोग रंग, गुलाल, अबीर लगाकर आपस में मिठाई बांटकर नगरीय इलाकों में होली की परंपरा का निर्वाह कर लेते हैं। रं कल्याण समिति के महिमन सिंह ह्यांकी का कहना है कि रं समाज के लोगों ने होली की मूल परंपरा को अपनाने का अतीतकाल से ही कोई प्रयास नहीं किया। यही वजह है कि होली में प्रचलित गीतों के बारे में यहां के लोग कुछ नहीं जानते। कुमाऊं के अन्य हिस्सों में शास्त्रीय संगीत पर आधारित होली गायन की परंपरा है, लेकिन रं समाज में ऐसा कुछ नहीं होता।
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कुमाऊं के अन्य हिस्सों में महिलाएं और पुरुष समान रूप से होली का गायन करते हैं। होली की परंपरा का यहां तक न पहुंच पाने के पीछे कारण बताया जाता है कि रं समाज के लोग अपनी बोली और संस्कृति के कारण कुमाऊं के अन्य लोगों के साथ नहीं मिल पाए। इस कारण होली के समय प्रचलित साहित्य से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता ही नहीं रहा। यहां तक कि होली की मूल परंपरा के बारे में भी रं समाज के लोग बहुत ज्यादा कुछ नहीं जानते।
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रं साहित्य में होली गीतों के लिए कोई स्थान नहीं है। अब धीरे-धीरे लोग रंग, गुलाल, अबीर लगाकर आपस में मिठाई बांटकर नगरीय इलाकों में होली की परंपरा का निर्वाह कर लेते हैं। रं कल्याण समिति के महिमन सिंह ह्यांकी का कहना है कि रं समाज के लोगों ने होली की मूल परंपरा को अपनाने का अतीतकाल से ही कोई प्रयास नहीं किया। यही वजह है कि होली में प्रचलित गीतों के बारे में यहां के लोग कुछ नहीं जानते। कुमाऊं के अन्य हिस्सों में शास्त्रीय संगीत पर आधारित होली गायन की परंपरा है, लेकिन रं समाज में ऐसा कुछ नहीं होता।
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