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चौंसाल गांव के किसान अब बन गए मजदूर
Fri, 05 Apr 2019 10:41 PM IST
kamlesh kamlesh
ब्यूरो/ अमर उजाला , डीडीहाट (पिथौरागढ़)।
ब्यूरो/ अमर उजाला , डीडीहाट (पिथौरागढ़)।
Published by: kamlesh kamlesh
Updated Fri, 05 Apr 2019 10:41 PM IST
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कभी आबाद रहने वाला चौंसाल गांव आज वीरान है।
- फोटो : पिथौरागढ़
कनालीछीना विकास खंड के चौंसाल गांव के किसान वर्तमान में किसी तरह मेहनत, मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण में जुटे हैं। आठ-दस वर्ष पहले गांव के खेत धान और अन्य फसलों से लहलहाते थे, तब काफी खुशहाली थी। वर्तमान में खेत बंजर हो गए हैं। वन्यजीवों के आतंक के चलते ग्रामीणों ने अब खेती करना ही छोड़ दिया है। गांव से लगातार पलायन जारी है।
भागीचौरा क्षेत्र के चौसाल गांव में वर्ष 2010 तक 350 परिवारों के करीब 1200 लोग निवास करते थे। अधिकांश परिवार पूरी तरह खेती पर निर्भर थे। 2010 के बाद अचानक बंदर और जंगली सुअरों का आतंक बढ़ने से लोग खेती से विमुख हो गए और उन्होंने गांव से पलायन शुरू कर दिया। ठाकुर और अनुसूचित जाति बाहुल्य इस गांव में वर्तमान में 120 परिवारों के महज 325 लोग ही रह गए हैं। इनमें भी आर्थिक रूप से कमजोर परिवार ही अधिक है। गांव में 250 से अधिक बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे हैं जबकि युवा वर्ग रोजगार की तलाश में पलायन कर गया है।
राज्य आंदोलनकारी भरत ऐरी का कहना है कि रोजगार के लिए पलायन और जंगली जानवरों के आतंक के चलते 95 फीसदी लोगों ने खेतीबाड़ी छोड़ दी है। कभी धान और अन्य फसलों से लहलहाने वाले खेत वर्तमान में बंजर पड़े हैं। गांव में रह गए लोग किसी तरह मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। गांव सड़क से जुड़ा है, पानी की कोई कमी नहीं है। बावजूद गांव वीरान होने के कगार पर पहुंच गया है। ऐरी कहते हैं जब तक वन्य जीवों के आतंक को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते तब तक गांव खुशहाल नहीं हो सकता है।
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भागीचौरा क्षेत्र के चौसाल गांव में वर्ष 2010 तक 350 परिवारों के करीब 1200 लोग निवास करते थे। अधिकांश परिवार पूरी तरह खेती पर निर्भर थे। 2010 के बाद अचानक बंदर और जंगली सुअरों का आतंक बढ़ने से लोग खेती से विमुख हो गए और उन्होंने गांव से पलायन शुरू कर दिया। ठाकुर और अनुसूचित जाति बाहुल्य इस गांव में वर्तमान में 120 परिवारों के महज 325 लोग ही रह गए हैं। इनमें भी आर्थिक रूप से कमजोर परिवार ही अधिक है। गांव में 250 से अधिक बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे हैं जबकि युवा वर्ग रोजगार की तलाश में पलायन कर गया है।
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राज्य आंदोलनकारी भरत ऐरी का कहना है कि रोजगार के लिए पलायन और जंगली जानवरों के आतंक के चलते 95 फीसदी लोगों ने खेतीबाड़ी छोड़ दी है। कभी धान और अन्य फसलों से लहलहाने वाले खेत वर्तमान में बंजर पड़े हैं। गांव में रह गए लोग किसी तरह मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। गांव सड़क से जुड़ा है, पानी की कोई कमी नहीं है। बावजूद गांव वीरान होने के कगार पर पहुंच गया है। ऐरी कहते हैं जब तक वन्य जीवों के आतंक को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते तब तक गांव खुशहाल नहीं हो सकता है।
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