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ईको टूरिज्म को सतत विकास का मॉडल बनाया जाए
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Fri, 04 Mar 2016 10:30 PM IST
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ईको टूरिज्म
- फोटो : अमर उजाला
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राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रकृति, संस्कृति और जैव विविधता पर चल रहे राष्ट्रीय सेमिनार में वक्ताओं ने ईको टूरिज्म को उत्तराखंड में सतत विकास का मॉडल बनाया जाने पर जोर दिया। सेमिनार में यारसागंबू के अवैज्ञानिक दोहन से पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव पर गंभीर चिंता जताई। भारत-तिब्बत व्यापार में धारचूला के रं समाज की भूमिका और इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर आ रहे परिवर्तन की जानकारी दी गई।
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उत्तराखंड के पलायन पर प्रो. बीआर पंत ने कहा कि गांवों में जब तक खुशहाली नहीं आती तब तक पलायन नहीं रुक सकता। गांवों में ढांचागत सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए। प्रो. प्रभात उप्रेती ने कहा कि पर्यटन से पर्यावरण पर होने वाले नुकसान की जानकारी देते हुए कहा कि ईको टूरिज्म को ही सतत विकास का आधार बनाया जाना चाहिए। हिंदी विभाग में कार्यरत डा. शांति ने रं समाज और तिब्बत व्यापार का संबंध पर शोधपत्र पढ़ा। कहा कि व्यापार सीमित हो जाने से सीमांत के लोगों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। डा. सीएस नेगी ने यारसागंबू के अवैज्ञानिक दोहन, इसके आर्थिक पक्ष, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की विस्तार से जानकारी दी। उच्च हिमालयी बुग्यालों में मानव हस्तक्षेप अत्यधिक बढ़ने से यारसागंबू का कवक समाप्त होता जा रहा है। शुक्रवार को डा. प्रभा पंत ने फूलों के जीवनदर्शन, डा. जेएस मेहता ने सतत कृषि वानिकी, डा. जीबी पांडे ने मशरूम उत्पादन के फायदे पर शोधपत्र प्रस्तुत किए। राजीव जोशी के संयोजन में न्योली, भगनौल, चांचरी, हुड़काबौल की प्रस्तुति दी गई। इसमें शांति देवी, तारा सिंह, नारायण सिंह, मोतीराम, रमेश राम ने हिस्सा लिया।
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गांवों की हालत में नहीं आया बदलाव
पिथौरागढ़। सेमिनार के अंतिम सत्र में इतिहासकार पद्मश्री डा. शेखर पाठक ने अस्कोट-आराकोट अभियान पर केंद्रित स्लाइड शो किया। इसमें कहा गया कि हर दस वर्ष में यह यात्रा निकाली जाती है लेकिन यह देखा गया है कि राज्य गठन के बाद भी गांवों की हालत में बदलाव नहीं आया है। रही सही कसर 2013 की आपदा से निकाल दी। डा. पाठक का कहना है कि उत्तराखंड के लिए सही विकास की नीति अभी तक नहीं बन पाई है। गांवों को खड़ंजा कल्चर से बाहर नहीं निकवला जा सका है। यही सबसे बड़ी विडंबना है।
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