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Pithoragarh News: पहाड़ों की पहचान मिटा रहा डाईबैक रोग, दम तोड़ रहे औषधीय पेड़-पौधे
Sun, 20 Sep 2026 11:24 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 20 Sep 2026 11:24 PM IST
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पिथौरागढ़। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाने वाले पदम, बेड़ू, तिमिल जैसे कई महत्वपूर्ण पेड़-पौधे अब विलुप्त होने के कगार पर हैं। एलएसएम परिसर के वनस्पति विज्ञान के शोधार्थियों के एक शोध में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इन पेड़ों की उम्र लगातार घट रही है और ये तेजी से गायब हो रहे हैं जिससे पहाड़ों की विशिष्ट पहचान खतरे में पड़ गई है।
प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में 1200 से 2400 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले पदम, बेड़ू, तिमिल और दुधिल जैसे पेड़ पर्यावरणीय और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। शोधार्थियों के अनुसार, इन प्रजातियों के 60 से 95 फीसदी पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं। इसका प्रमुख कारण ''''डाईबैक रोग'''' है। सेराम्बीसिडी परिवार के कुकड़ू कीट इन पेड़ों के तने और शाखाओं में गहरे छेद कर रहे हैं जिससे जल और पोषक तत्वों का संचार बाधित हो रहा है। परिणामस्वरूप, पेड़ एक या दो साल के भीतर ही सूख जाते हैं। इसके अतिरिक्त, पहाड़ों के बढ़ते तापमान के कारण यहां का मौसम इन पेड़ों के अनुकूल नहीं रह गया है जिससे उनके पनपने और बढ़ने की गति बेहद धीमी हो गई है।
अन्य प्रमुख कारण
चीड़ के जंगलों का विस्तार: हिमालयी क्षेत्रों में चीड़ के वनों के फैलाव से पिरुल (चीड़ की पत्तियां) जमीन पर मोटी परत बना रहा है। यह परत पदम और अंजीर प्रजाति के पेड़ों के बीजों को मिट्टी और नमी तक पहुंचने से रोक रही है, जिससे नए पेड़ नहीं पनप पा रहे हैं।
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जलवायु परिवर्तन और असमय फूल खिलना : जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों के तापमान में वृद्धि हुई है। पदम में पारंपरिक रूप से शरद ऋतु में फूल आते हैं लेकिन अब इनमें असमय फूल खिल रहे हैं। ये फूल बर्फबारी या पाले की अधिकता से नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण बीज नहीं बन पा रहे हैं।
प्रभावित क्षेत्र
इन प्रजातियों के पेड़ कुमाऊं क्षेत्र में रामगढ़, मुक्तेश्वर, जागेश्वर, बिनसर, रानीखेत, कांडा, कपकोट और पिथौरागढ़ में बहुतायत में पाए जाते हैं। गढ़वाल क्षेत्र में जोशीमठ, पीपलकोटी, हेलांग, उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल में भी ये पेड़ मिलते हैं।
संरक्षण की आवश्यकता
पर्वतीय प्रदेश में पदम, बेड़ू, तिमिल आदि प्रजाति के पेड़ों का तेजी से सूखकर गायब होना एक गंभीर चिंता का विषय है। इसका मुख्य कारण कीटों का हमला और पर्यावरण असंतुलन है। इन्हें संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। - डॉ. कमलेश कुमार भाकुनी, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, एलएसएम परिसर, पिथौरागढ़
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प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में 1200 से 2400 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले पदम, बेड़ू, तिमिल और दुधिल जैसे पेड़ पर्यावरणीय और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। शोधार्थियों के अनुसार, इन प्रजातियों के 60 से 95 फीसदी पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं। इसका प्रमुख कारण ''''डाईबैक रोग'''' है। सेराम्बीसिडी परिवार के कुकड़ू कीट इन पेड़ों के तने और शाखाओं में गहरे छेद कर रहे हैं जिससे जल और पोषक तत्वों का संचार बाधित हो रहा है। परिणामस्वरूप, पेड़ एक या दो साल के भीतर ही सूख जाते हैं। इसके अतिरिक्त, पहाड़ों के बढ़ते तापमान के कारण यहां का मौसम इन पेड़ों के अनुकूल नहीं रह गया है जिससे उनके पनपने और बढ़ने की गति बेहद धीमी हो गई है।
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अन्य प्रमुख कारण
चीड़ के जंगलों का विस्तार: हिमालयी क्षेत्रों में चीड़ के वनों के फैलाव से पिरुल (चीड़ की पत्तियां) जमीन पर मोटी परत बना रहा है। यह परत पदम और अंजीर प्रजाति के पेड़ों के बीजों को मिट्टी और नमी तक पहुंचने से रोक रही है, जिससे नए पेड़ नहीं पनप पा रहे हैं।
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जलवायु परिवर्तन और असमय फूल खिलना : जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों के तापमान में वृद्धि हुई है। पदम में पारंपरिक रूप से शरद ऋतु में फूल आते हैं लेकिन अब इनमें असमय फूल खिल रहे हैं। ये फूल बर्फबारी या पाले की अधिकता से नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण बीज नहीं बन पा रहे हैं।
प्रभावित क्षेत्र
इन प्रजातियों के पेड़ कुमाऊं क्षेत्र में रामगढ़, मुक्तेश्वर, जागेश्वर, बिनसर, रानीखेत, कांडा, कपकोट और पिथौरागढ़ में बहुतायत में पाए जाते हैं। गढ़वाल क्षेत्र में जोशीमठ, पीपलकोटी, हेलांग, उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल में भी ये पेड़ मिलते हैं।
संरक्षण की आवश्यकता
पर्वतीय प्रदेश में पदम, बेड़ू, तिमिल आदि प्रजाति के पेड़ों का तेजी से सूखकर गायब होना एक गंभीर चिंता का विषय है। इसका मुख्य कारण कीटों का हमला और पर्यावरण असंतुलन है। इन्हें संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। - डॉ. कमलेश कुमार भाकुनी, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, एलएसएम परिसर, पिथौरागढ़