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Pithoragarh News: माता का ऐसा मंदिर नवरात्र में नहीं खुलते जिसके कपाट
Sun, 26 Mar 2023 11:56 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 26 Mar 2023 11:56 PM IST
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डीडीहाट के आंकोट स्थित मां भगवती का मंदिर।
डीडीहाट (पिथौरागढ़)। डीडीहाट से पांच किमी दूर स्थित आंकोट ग्राम सभा में मां भगवती शक्तिपीठ के रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि मां सती के कमर से नीचे का भाग इस स्थान पर गिरा था। तभी से इस स्थान को मां के शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। बावजूद इसके नवरात्र में इस मंदिर के कपाट नहीं खोले जाते हैं।
एक ओर नवरात्र में मंदिरों में भक्तों की पूजा-अर्चना के लिए भीड़ लगी रहती है। वहीं यह इकलौता ऐसा मंदिर है जहां नवरात्र में पूजा-अर्चना नहीं होती है। मान्यता के अनुसार इस मंदिर को सालभर में मात्र चार पूर्णिमा तिथि (माघ, कार्तिक, सावन, वैशाखी) पर ही श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है।
मंदिर को नवरात्र पर नहीं खोलने का मुख्य कारण स्पष्ट नहीं हैं परंतु मान्यता के अनुसार मंदिर के अंदर जाने वाला पुजारी भी अपनी आंखों में पट्टी लगाकर मैया को स्नान आदि कराता है। आंकोट निवासी शेखर सिंह का कहना है कि उनके बुजुर्गों ने भी इस मंदिर को नवरात्र में नहीं खोला था।
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मुख्य पुजारी महेश चंद्र जोशी का कहना है कि इस मंदिर को मां भगवती के शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है लेकिन पौराणिक मान्यताओं में इस मंदिर को साल में चार बड़ी पूर्णिमा पर ही खोलने की परंपरा है। सभी ग्रामीण उसी परंपरा का निर्वहन करते हैं।
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एक ओर नवरात्र में मंदिरों में भक्तों की पूजा-अर्चना के लिए भीड़ लगी रहती है। वहीं यह इकलौता ऐसा मंदिर है जहां नवरात्र में पूजा-अर्चना नहीं होती है। मान्यता के अनुसार इस मंदिर को सालभर में मात्र चार पूर्णिमा तिथि (माघ, कार्तिक, सावन, वैशाखी) पर ही श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है।
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मंदिर को नवरात्र पर नहीं खोलने का मुख्य कारण स्पष्ट नहीं हैं परंतु मान्यता के अनुसार मंदिर के अंदर जाने वाला पुजारी भी अपनी आंखों में पट्टी लगाकर मैया को स्नान आदि कराता है। आंकोट निवासी शेखर सिंह का कहना है कि उनके बुजुर्गों ने भी इस मंदिर को नवरात्र में नहीं खोला था।
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मुख्य पुजारी महेश चंद्र जोशी का कहना है कि इस मंदिर को मां भगवती के शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है लेकिन पौराणिक मान्यताओं में इस मंदिर को साल में चार बड़ी पूर्णिमा पर ही खोलने की परंपरा है। सभी ग्रामीण उसी परंपरा का निर्वहन करते हैं।