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कनार मेले में जान जोखिम डालकर पहुंचेंगे श्रद्धालु
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कनार गांव को जाने के लिए अस्थाई पुल से नाला पार करता ग्रामीण।
- फोटो : PITHORAGARH
अस्कोट (पिथौरागढ़)। कनार गांव में लगने वाले प्रसिद्ध मेले में जाने के लिए इस बार श्रद्धालुुओं को परीक्षा देनी होगी। जुलाई की आपदा के बाद से कई जगह रास्ते खराब हैं। खतरनाक गाड़-गधेरे आवाजाही करने वालों को डरा रहे हैं। जरा से सावधानी हटी तो गधेरों में गिरने का डर हमेशा रहता है।
कनार गांव तहसील बंगापानी के बरम कस्बे से 16 किमी की दूरी पर है। छह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित इस गांव में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मां भगवती का प्रसिद्ध मेला लगता है। इसमें जाराजिबली, पय्यापौड़ी, बरम, मेतली, छोरीबगड़, तोली और धारचूला क्षेत्र के गांवों से कई लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इस बार मां के भक्तों को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। जुलाई की आपदा में कई जगह पैदल पुल और मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिन्हें ग्रामीणों ने श्रमदान कर बनाया था।
मंदिर में लगने वाले इस मेले का बड़ा महत्व है। ऐसे में खराब रास्ते भक्तों की परीक्षा लेंगे। कई जगह घोड़ों और खच्चरों के चलने लायक भी रास्ते नहीं बचे हैं। इसके बावजूद भी लोग 20-20 किलो सामान सिर पर रखकर इन खतरनाक रास्तों से आवाजाही करते हैं। आपदा के चार माह बाद भी इन क्षतिग्रस्त रास्तों को सुधारने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया है।
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कनार गांव तहसील बंगापानी के बरम कस्बे से 16 किमी की दूरी पर है। छह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित इस गांव में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मां भगवती का प्रसिद्ध मेला लगता है। इसमें जाराजिबली, पय्यापौड़ी, बरम, मेतली, छोरीबगड़, तोली और धारचूला क्षेत्र के गांवों से कई लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इस बार मां के भक्तों को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। जुलाई की आपदा में कई जगह पैदल पुल और मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिन्हें ग्रामीणों ने श्रमदान कर बनाया था।
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मंदिर में लगने वाले इस मेले का बड़ा महत्व है। ऐसे में खराब रास्ते भक्तों की परीक्षा लेंगे। कई जगह घोड़ों और खच्चरों के चलने लायक भी रास्ते नहीं बचे हैं। इसके बावजूद भी लोग 20-20 किलो सामान सिर पर रखकर इन खतरनाक रास्तों से आवाजाही करते हैं। आपदा के चार माह बाद भी इन क्षतिग्रस्त रास्तों को सुधारने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया है।
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