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बासमती चावल के साथ ही दाल, फलों से दूर होंगे
केबी पाल/अमर उजाला, अस्कोट
Updated Sun, 08 Oct 2017 10:22 PM IST
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पंचेश्वर बांध में डूब जाएगी बमनिया कुर्जा घास
- फोटो : अमर उजाला
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पंचेश्वर बांध परियोजना हंसराज, जड़न, झूसिया बासमती चावल के साथ ही दाल और फलों से घाटी से क्षेत्र के लोगों को दूर कर देगी। लोगों को अब ये चिंता सताने लगी है। बासमती की ये तीन किस्में बेहद स्वादिष्ट होती हैं। मालभोग (अंगुलियों के साइज का केला) जैसा केला भी महाकाली घाटी में पाया जाता है, जो शायद फिर नसीब न हो।
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हंसराज, जड़न, झूसिया बासमती के साथ ही परंपरागत धान की किस्म अंचना, किरमुली, थाचीनी, गुरुधौला, चिनभूरी, कालजड़या, झीनी की पैदावार बांध प्रभावित क्षेत्र में होती है। खुशबूदार खजिया चावल भी इलाके की पहचान है। खजिया का भात नहीं बनता। यह च्यूड़े (भीगे धान को भूनकर और ओखल में कूटकर बनता है) बनाने में काम आता है।
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महाकाली नदी से सटे बगड़ीहाट, तीतरी, हंसेश्वर, चमतोली, घिंघरानी, सुनखोली, ड्योड़ा, रणुवा, चकद्वारी इलाके में हर तीन महीने में उड़द की पैदावार हो जाती है। अमूमन उड़द की फसल छह माह में एक बार होती है। मसूर, गहत, भट, मडुवा भी यहां खूब होता है। इसके अलावा आम, पपीता के साथ ही मालभोग, मोरमई, दुदकेला घाटी की पहचान है। बांध निर्माण के साथ ही यह सब भी छूट जाएगा।
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घास के झाड़ू का व्यवसाय छिनेगा
महाकाली नदी घाटी के लोग बमनियाकुर्जा नामक घास से झाड़ू तैयार करते हैं। यह घास घाटी वाले इलाकों में वर्षभर होती है। ग्रामीण अपने लिए तो झाड़ू का उपयोग करते ही हैं, झाड़ू को बढ़िया पैकिंग के साथ बेचा भी जाता है। यह घास सालभर लोगों को रोजगार देती है। बांध बनने के बाद प्रभावितों का झाड़ू व्यवसाय भी छिन जाएगा।
आने वाली पीढ़ी को ये सब नहीं होगा नसीब
तीतरी निवासी हरबोधनी पंत (86) कहती हैं कि उनके पूर्वजों और उन्होंने अपना सारा जीवन इन्हीं फसलों के सहारे व्यतीत किया है। बांध बनने की दशा में आने वाली पीढ़ी को ये सब नसीब नहीं होगा। स्यालतड़ निवासी नर सिंह ऐरी (90) कहते हैं कि इलाके के लोगों का खेतीबाड़ी से ही पालन-पोषण होता है। विस्थापन से पहले सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि लोगों को अपनी फसलों, फलों से दूर न होना पड़े। क्षेत्र पंचायत सदस्य त्रिलोक सिंह बिष्ट कहते हैं कि परंपरागत बीजों को बचाने के लिए क्षेत्र में बड़े-बड़े अभियान चलते हैं। यदि उत्पादन क्षेत्र ही नहीं रहेगा तो इन अभियानों पर भी संकट मंडराएगा।