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जोखिम में जान: ट्रॉली खींचकर स्कूल जाने की मजबूरी, सिस्टम की अनदेखी बढ़ा रही घुरुड़ी; ग्रामीणों का छलका दर्द

Fri, 07 Aug 2026 10:56 PM IST
रमेश धामी Updated Fri, 07 Aug 2026 10:56 PM IST
सार

घुरुड़ी, मनकोट और टांगा के बच्चे गोरी व सेरघटिया नदी पर पक्के पुल न होने के कारण ट्रॉली की रस्सी खुद खींचकर नदी पार करते हैं। बारिश में तो यह सफर और भी खतरनाक हो जाता है।

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A surging river, a trembling trolley... a world of hope on the other side of danger
जोखिम में जान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उफनती नदी, तेज बहाव और उसके ऊपर झूलती ट्रॉली... यही रास्ता है घुरुड़ी, मनकोट और टांगा के उन बच्चों का। इनके सपने स्कूल की चौखट तक पहुंचने के लिए हर दिन जिंदगी का जोखिम उठाते हैं। गोरी और सेरघटिया नदी पर पक्के पुल नहीं होने के कारण विद्यार्थी ट्रॉली की रस्सी खुद खींचकर नदी पार करने को मजबूर हैं। बारिश में जब नदियां उफान पर होती हैं तब यह सफर और खतरनाक हो जाता है।

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संवाद न्यूज एजेंसी की टीम जब इन गांवों की जमीनी हकीकत जानने पहुंची तो बच्चों और ग्रामीणों ने बताया कि नदी पार करना उनके लिए रोजमर्रा की मजबूरी बन चुका है। ट्रॉली नदी के बीच पहुंचते ही तेज बहाव और पत्थरों से टकराती लहरें डर पैदा करती हैं। इसके बावजूद पढ़ाई जारी रखने के लिए बच्चों को हर दिन इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।
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घुरुड़ी की कक्षा आठ की छात्रा लक्ष्मी, कक्षा 11 की ज्योति और कक्षा 12 की प्रियंका तथा मनकोट की भावना ने बताया कि ट्रॉली जब नदी के बीच पहुंचती है तो तेज बहाव के कारण डर और बढ़ जाता है। पानी की बौछारें ट्रॉली तक पहुंचती हैं और कई बार ऐसा लगता है कि संतुलन बिगड़ने पर बड़ा हादसा हो सकता है। उनका कहना है कि सुरक्षित पुल होता तो उन्हें इस खतरे से होकर स्कूल नहीं जाना पड़ता।
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बीमार और गर्भवती भी ट्रॉली के भरोसे
सेरघटिया नदी पार करने वाले टांगा के ग्रामीणों की मुश्किल सिर्फ स्कूली बच्चों तक सीमित नहीं है। गंभीर सिंह, रणजीत सामंत और धाना देवी ने बताया कि गांव में किसी के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत हो तो नदी पार कराने के लिए ट्रॉली ही एकमात्र सहारा है।

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात में नदी का बहाव तेज होने पर यह रास्ता जानलेवा हो जाता है। ऐसे में परिवार के लोग मरीज या गर्भवती को ट्रॉली से नदी पार कराते समय हर पल अनहोनी की आशंका में रहते हैं। उनका सवाल है कि आखिर कब तक उन्हें और उनके बच्चों को इस जोखिम के भरोसे रहना पड़ेगा।

सड़क पहुंची, पुल आठ साल से फाइलों में लटका
टांगा तक सेरघटिया नदी के किनारे सड़क वर्ष 2018 में पहुंच गई थी। इसके बाद यहां पक्के पुल का प्रस्ताव तैयार किया गया। आठ साल गुजरने के बाद भी पुल का निर्माण शुरू नहीं हो सका है। ग्रामीणों के लिए सड़क पहुंचने के बाद नदी पर पुल बनने की उम्मीद जगी थी लेकिन अब वह इंतजार में बदल चुकी है।

घुरुड़ी और मनकोट के विद्यार्थियों की आवाजाही सुगम बनाने के लिए गोरी नदी पर भी पुल स्वीकृत किया गया था। पुल के एबेटमेंट तक बनाए गए। वर्ष 2013 में नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। इसके बाद पुल का निर्माण आगे नहीं बढ़ सका।
ग्रामीणों का कहना है कि व्यवस्था ने भी समस्या का स्थायी समाधान खोजने के बजाय हाथ खींच लिए। नतीजा यह है कि वर्षों बाद भी बच्चे और ग्रामीण उसी अस्थायी ट्रॉली के सहारे नदी पार कर रहे हैं।

सुरक्षा के निर्देश लेकिन मौके से पीआरडी जवान गायब
नदी पार करने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए ट्रॉलियों के पास पीआरडी जवान तैनात करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद ग्रामीणों के अनुसार मौके पर जवान मौजूद नहीं रहते। ऐसे में विद्यार्थी खुद रस्सी खींचकर ट्रॉली को नदी के दूसरे छोर तक ले जाते हैं।

बारिश के दौरान जब नदी का बहाव और तेज हो जाता है तब सुरक्षा व्यवस्था का यह अभाव किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। सवाल यह भी है कि जब बच्चों की सुरक्षा के लिए जवानों की तैनाती के निर्देश जारी हो चुके हैं तो मौके पर उनकी मौजूदगी सुनिश्चित क्यों नहीं की जा रही है।

बोले ग्रामीण
उफनती नदियों पर पक्के पुल न बनने से ट्रॉली ही आवाजाही का एकमात्र जरिया है। हमें बच्चों के घर पहुंचने तक उनकी चिंता सताती है। जब बच्चे सुरक्षित घर पहुंचते हैं तो हम ईश्वर का धन्यवाद अदा करते हैं। -रणजीत सिंह सामंत, घुरुड़ी

हमारे हितों अनदेखी हुई है। बच्चों के भविष्य के लिए उन्हें जान जोखिम में डालकर ट्रॉली से स्कूल भेजना मजबूरी है। यदि पक्के पुल बनते तो हमारी परेशानी और चिंता हमेशा के लिए दूर हो जाती। -दलीप चंद, मनकोट



ट्रॉली की जगह पक्के पुल क्यों नहीं बने लोनिवि से इसकी जानकारी ली जाएगी। ट्रॉली के पास विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए पीआरडी जवानों की तैनाती के निर्देश संबंधित विभाग को दी गई है। जहां पीआरडी जवान नहीं हैं वहां जल्द तैनाती होगी।
-आशीष जोशी, एसडीएम, धारचूला

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