एक फायर स्टेशन के सहारे जनपद

Pithoragarh Updated Fri, 23 Nov 2012 12:00 PM IST
पिथौरागढ़। सीमावर्ती पिथौरागढ़ जिले में आग की घटनाओं पर काबू पाने के लिए पुख्ता प्रबंध नहीं हैं। जिले में सिर्फ एक फायर स्टेशन मुख्यालय में है। इसके अलावा शेष इलाके रामभरोसे हैं। साथ ही आग से बचाव के लिए सरकारी महकमों में भी इंतजाम नामभर के हैं।
आग की लपटों से निपटने के लिए जिले का सुरक्षा तंत्र चरमराया हुआ है। अकेला फायर स्टेशन जिला मुख्यालय में है। पर इसकी हालत भी उम्मीद लायक कम है। मुख्य अगिभनश्मन अधिकारी का पद खाली है। पूरी बागडोर फायर स्टेशन आफिसर के पास है। लीडिंग फायरमैन का एक एवं फायरमैन के दो पद रिक्त हैं। और तो और आग बुझाने वाले वाहनों के संचालन के लिए भी पर्याप्त संख्या में ड्राइवर नहीं हैं। पांच वाहनों को चलाने के लिए मात्र तीन ड्राइवर हैं। चालकों के छह पदों में से तीन ही भरे जा सके हैं।
मुख्यालय से बाहर के हाल तो और भी खराब है। धौलीगंगा विद्युत परियोजना के चलते धारचूला परिचय का मोहताज नहीं है। पर अगर यहां आग लगी तो यह शहर बेबस हो जाएगा। 92 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ के फायर स्टेशन का मुंह ताकना उसकी विवशता है। ऐसे ही हाल मुनस्यारी के हैं। 128 किमी दूर पिथौरागढ़ से मदद पहुंचने तक आग का क्या हाल करेगी, समझा जा सकता है। 101 किलोमीटर दूर बेरीनाग, 60 किमी दूर डीडीहाट, पाताल गुफा के लिए मशहूर गंगोलीहाट जैसे शहर भी मदद के लिए मुख्यालय की ओर ताकने को मजबूर हैं। संकरी सड़क में आपदा के वक्त फायर ब्रिगेड के वाहन का निकलना भी चुनौती बनता है।
वैसे जिले के ज्यादातर सरकारी कार्यालयों में भी बचाव के प्रबंध ढीलेढाले हैं। विकास भवन, कलक्ट्रेट आदि को छोड़ ज्यादातर बैंकों, कारोबारी प्रतिष्ठानों, औद्योगिक इकाइयों आदि में अगिभन दुर्घटनाओं से बचाव के उपाय बस कामचलाऊ हैं। स्कूल, अस्पताल, होटलों में भी आग से बचाव के उपाय कम खानापूरी ज्यादा है। अगिभनश्मन विभाग का कहना है कि आग से बचाव के लिए बालू-रेता, पानी, फायर हुक आदि के साथ अगिभन सुरक्षा से संबंधित प्रमाणपत्र होना चाहिए। पर इन नियमों की अमूमन अनदेखी हो रही है। 2010 से अब तक आग की 43 घटनाएं हो चुकी हैं। जिनमें दो की मौत एवं लाखों रुपये का नुकसान हो चुका है।

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