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19 वर्ष में 50 फीसदी कम हो गई छात्रसंख्या
ब्यूरो/अमर उजाला, झूलाघाट
Updated Fri, 31 Mar 2017 10:45 PM IST
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झूलाघाट का राजकीय इंटर कालेज
- फोटो : अमर उजाला
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सरकारी स्कूलों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेपाल सीमा पर स्थित राजकीय इंटर कॉलेज झूलाघाट में 19 वर्ष में छात्रसंख्या 50 फीसदी तक कम हो गई है। शिक्षकों की कमी वाले इस विद्यालय में लोगों ने अपने बच्चों का प्रवेश कराना कम कर दिया है। विद्यालय में प्रधानाचार्य समेत शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के 10 पद रिक्त हैं।
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झूलाघाट के आसपास के चार दर्जन से अधिक गांवों और नेपाल के बच्चों को शिक्षा देने के लिए 1954 में झूलाघाट में जूनियर हाईस्कूल खोला गया। 1976 में विद्यालय का उच्चीकरण कर इसे हाइस्कूल बना दिया गया। पड़ोसी देश नेपाल के भी 2 दर्जन से अधिक गांवों के बच्चे पहले इसी विद्यालय में शिक्षा लेने के लिए आते थे। जनता की मांग को देखते हुए 1988 में इसे इंटर कॉलेज का दर्जा मिला।
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1998 में विद्यालय में 470 की छात्र संख्या थी, जो वर्तमान में घटकर 232 रह गई है। विद्यालय में गणित और भौतिकी के प्रवक्ता नहीं हैं। हिंदी के प्रवक्ता शुक्रवार को सेवानिवृत्त हो गए हैं। अंग्रेजी, अर्थशास्त्र विषय पढ़ाने के लिए गेस्ट टीचर तैनात थे। उनकी सेवा भी समाप्त हो गई है। हाइस्कूल में हिंदी अध्यापक नहीं हैं। साथ ही कार्यालय में काम करने के लिए मुख्य सहायक और कनिष्ठ सहायक के भी 1-1 पद रिक्त हैं। विद्यालय में स्वच्छक भी नहीं है।
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सरकार स्कूलों की दशा सुधारे
स्थानीय निवासी त्रिभुवन भट्ट का कहना है कि सीमांत के स्कूलों में कोई भी नहीं पढ़ना चाहता है। इसका कारण विद्यालयों में पर्याप्त सुविधाओं का अभाव है। सरकार को चाहिए कि दूरस्थ स्थानों पर स्थित इन स्कूलों की दशा सुधारे, ताकि लोगों का सरकारी स्कूलों के प्रति लगाव बना रहे।
पलायन का मुख्य कारण शिक्षा
स्थानीय निवासी सुभाष पंगरिया का कहना है कि सीमांत के इस कस्बे से पलायन का मुख्य कारण भी शिक्षा व्यवस्था का गिरते रहना है। सभी अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, लेकिन सरकार इस ओर कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। अब सरकार को शिक्षा व्यवस्था सुधारनी होगी।
सुविधा बढ़ने के बजाए कम हो गई
स्थानीय निवासी परमानंद गिरी का कहना है कि एक समय था कि नेपाल से भी लोग शिक्षा ग्रहण करने झूलाघाट के स्कूल में आते थे, लेकिन समय बीतने के साथ ही सुविधाएं कम होती जा रही हैं। विद्यालय में शिक्षक न होने के कारण बच्चों को शिक्षा के लिए अन्य नगरों में जाना पड़ रहा है। यह गलत लक्षण है।
गरीब लोग ज्यादा संकट में
स्थानीय निवासी बृजेश गड़कोटी का कहना कि सीमा पर बसे इस कस्बे में हाइस्कूल और इंटर तक की शिक्षा का कोई और माध्यम नहीं है। यहां पर कोई प्राइवेट स्कूल तक नहीं है। इतने पुराने विद्यालय के प्रति अनदेखी का खामियाजा यहां के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। गरीब लोग ज्यादा संकट में हैं।