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बांध का विरोध कहीं गंभीर रूप न ले ले
Updated Tue, 25 Jul 2017 10:42 PM IST
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झूलाघाट (पिथौरागढ़)। महाकाली नदी पर बनाए जाने वाले पंचेश्वर बांध के डूब क्षेत्र में आने वाला हर व्यक्ति गंभीर चिंता में है। लोगों की बातों से ऐसा लगता है कि कहीं बांध का विरोध गंभीर रूप न ले ले। जैसे-जैसे बांध के संबंध में लोगों तक जानकारी पहुंच रही है वैसे-वैसे लोगों में सरकार और डीपीआर बनाने वाली कंपनी के खिलाफ गुस्सा बढ़ते जा रहा है।
लोगों को आशंका है कि जब डीपीआर तैयार करते समय ही इतना ज्यादा भेदभाव किया गया है तो बांध बनने के बाद लोगों की और अधिक उपेक्षा हो जाएगी। डूब क्षेत्र के सबसे ज्यादा आबादी वाले झूलाघाट कस्बे की तो डीपीआर में पूरी तरीके से अवहेलना की गई है। झूलाघाट को एक व्यापारिक मंडी के बजाय माजिरकांडा ग्रामसभा का एक तोक मान रखा है, जबकि यह अंग्रेजों के दौर से भारत और नेपाल के लोगों की व्यापारिक मंडी रही है। अमर उजाला यहां के हर व्यक्ति से बांध के बारे में राय जानने की कोशिश कर रहा है।
बांध का काम शुरू होने की सूचना से डर
व्यापारी रमेश कलखुड़िया का कहना है कि उनके पिताजी ने यहां आकर कपड़े का व्यापार शुरू किया था। इस समय वह खुद कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। नदी के किनारे दुकान होने के कारण बरसात में नदी के बढ़ने से उतना डर नहीं लगता था, जितना अब बांध का काम अब शुरू होने बारे में जानकर डर लगने लगा है। वह कहते हैं कि वे अंतिम सांस तक बांध को न बनने देने के लिए लड़ते रहेंगे।
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जनता अब पीछे हटने वाली नहीं
व्यापारी नवीन नरियाल ने कहा कि हाल के दिनों में बांध को लेकर जिस तरह की सक्रियता बढ़ी है, उससे साफ जाहिर है कि बांध जरूर बन जाएगा। सरकार लोगों को बेघर करेगी और अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी। उन्होंने कहा कि वह बांध के विरोध में हर आंदोलन में हिस्सा लेंगे। भूख हड़ताल पर बैठेंगे। इस मुद्दे पर अब लड़ाई तेज करने की जरूरत है। जनता पीछे नहीं हटेगी।
इस सुरम्य घाटी को डूबने नहीं देंगे
समाजसेवी संजू कलखुड़िया का कहना है कि उनका जन्म झूलाघाट में हुआ है, यहीं से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है। यहीं के खेतों में खेला है। पिथौरागढ़ जाते समय जब दूर से झूलाघाट की घाटी को देखते हैं तो काली नदी के तट पर स्थित यह कस्बा उत्तराखंड की सुंदर घाटियों में से एक लगता है। वह कहते हैं कि इस सुरम्य घाटी को कभी डूबने नहीं देंगे। इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।
इस पीड़ा को सरकार समझे
रूई व्यापारी मोहम्मद अयूब का कहना है कि वह कई सालों से यहां व्यापार कर रहे हैं। उनके सभी बच्चों की पैदाइश झूलाघाट की है। अब ढलती उम्र में यहां से छोड़कर कहां जाएंगे। बच्चे भी बेरोजगार हैं, या तो सरकार बच्चों को रोजगार दे या बांध का काम रोेके, अन्यथा हम आरपार की लड़ाई करने को तैयार बैठे हैं। इस पीड़ा को सरकार ने समझना चाहिए।
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लोगों को आशंका है कि जब डीपीआर तैयार करते समय ही इतना ज्यादा भेदभाव किया गया है तो बांध बनने के बाद लोगों की और अधिक उपेक्षा हो जाएगी। डूब क्षेत्र के सबसे ज्यादा आबादी वाले झूलाघाट कस्बे की तो डीपीआर में पूरी तरीके से अवहेलना की गई है। झूलाघाट को एक व्यापारिक मंडी के बजाय माजिरकांडा ग्रामसभा का एक तोक मान रखा है, जबकि यह अंग्रेजों के दौर से भारत और नेपाल के लोगों की व्यापारिक मंडी रही है। अमर उजाला यहां के हर व्यक्ति से बांध के बारे में राय जानने की कोशिश कर रहा है।
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बांध का काम शुरू होने की सूचना से डर
व्यापारी रमेश कलखुड़िया का कहना है कि उनके पिताजी ने यहां आकर कपड़े का व्यापार शुरू किया था। इस समय वह खुद कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। नदी के किनारे दुकान होने के कारण बरसात में नदी के बढ़ने से उतना डर नहीं लगता था, जितना अब बांध का काम अब शुरू होने बारे में जानकर डर लगने लगा है। वह कहते हैं कि वे अंतिम सांस तक बांध को न बनने देने के लिए लड़ते रहेंगे।
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जनता अब पीछे हटने वाली नहीं
व्यापारी नवीन नरियाल ने कहा कि हाल के दिनों में बांध को लेकर जिस तरह की सक्रियता बढ़ी है, उससे साफ जाहिर है कि बांध जरूर बन जाएगा। सरकार लोगों को बेघर करेगी और अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी। उन्होंने कहा कि वह बांध के विरोध में हर आंदोलन में हिस्सा लेंगे। भूख हड़ताल पर बैठेंगे। इस मुद्दे पर अब लड़ाई तेज करने की जरूरत है। जनता पीछे नहीं हटेगी।
इस सुरम्य घाटी को डूबने नहीं देंगे
समाजसेवी संजू कलखुड़िया का कहना है कि उनका जन्म झूलाघाट में हुआ है, यहीं से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है। यहीं के खेतों में खेला है। पिथौरागढ़ जाते समय जब दूर से झूलाघाट की घाटी को देखते हैं तो काली नदी के तट पर स्थित यह कस्बा उत्तराखंड की सुंदर घाटियों में से एक लगता है। वह कहते हैं कि इस सुरम्य घाटी को कभी डूबने नहीं देंगे। इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।
इस पीड़ा को सरकार समझे
रूई व्यापारी मोहम्मद अयूब का कहना है कि वह कई सालों से यहां व्यापार कर रहे हैं। उनके सभी बच्चों की पैदाइश झूलाघाट की है। अब ढलती उम्र में यहां से छोड़कर कहां जाएंगे। बच्चे भी बेरोजगार हैं, या तो सरकार बच्चों को रोजगार दे या बांध का काम रोेके, अन्यथा हम आरपार की लड़ाई करने को तैयार बैठे हैं। इस पीड़ा को सरकार ने समझना चाहिए।