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अपनों की खैर-खबर को भटक रहे लोग

Sat, 22 Jun 2013 12:56 PM IST
देहरादून/राजेश शर्मा
देहरादून/राजेश शर्मा Updated Sat, 22 Jun 2013 12:56 PM IST
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people wandering of their dear ones

देहरादून स्थित अमर उजाला दफ्तर में फोन की घंटी बजी तो बोलने वाले की आवाज में परेशानी साफ झलक रही थी। अंबाला से मोहन लाल लाइन पर थे।

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साहब, मेरा भाई सुरेंद्र अग्रवाल केदारनाथ गया था, लापता है। मोहनलाल को बताया जाता है कि सरकार ने हेल्पलाइन बनाई है वहां बात क्यों नहीं करते।

उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
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बताते हैं कि हेल्पलाइन दर्जनों बार हेल्पलाइन में फोन लगा चुके हैं। कई बार तो लगी नहीं। एक दो बार लगी तो कंप्यूटराइज प्रवचन सुनाकर बंद हो गई।

इंतजामकार फिसड्डी साबित हो रहे
जब हजारों के मरने की आशंका हो तो जाहिर है कि आपदा बड़ी है। लेकिन आपदा के बाद सबसे पहले जो काम होना चाहिए उसी में उत्तराखंड के इंतजामकार फिसड्डी साबित हो गए। हेल्पलाइनें तो बनाई गईं लेकिन वह कितनी हेल्प कर रही है इसे जानने की फुर्सत किसी को नहीं है।
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मेरठ के माधवपुरम निवासी सुभाष चौधरी अपने भाई ललित और कई अन्य साथियों के साथ चार दिन से कभी देहरादून तो कभी ऋषिकेश और जौलीग्रांट के चक्कर काट रहे हैं। उन्हें बाबा के केदार के दर्शनों को गए अपने पिता संदीप चौधरी और छह साथियों की जानकारी नहीं मिल पा रही।

उनके अपने नहीं थे
हेल्पलाइन से जानकारी मिली कि उनके लोगों को बचाकर जौलीग्रांट अस्पताल लाया गया है। वे तुरंत दौड़े। लेकिन वहां उनके अपने नहीं थे। ऋषिकेश स्थित जयराम आश्रम, डिग्री कॉलेज और राज्य अतिथि गृह में बनाए गए राहत शिविरों को भी छान मारा नतीजा सिफर ही रहा।

मां, मत रो, मैं जिंदा हूं

बस्ती से आए राजकिशोर और दिल्ली के मदन मोहन का भी यही हाल है। उनके परिजनों का पता नहीं लग रहा। केवल नाम और नंबर लिखकर फिर बताएंगे कहकर उन्हें सांत्वना देने की कोशिश भर की जा रही है।


आधी-अधूरी सूची किस काम की
राज्य पुलिस के कंट्रोल रूम में पिछले तीन दिनों में केदारनाथ, जोशीमठ और अन्य आपदा प्रभावित क्षेत्रों से करीब दो हजार ऐसे लोगों की सूची भेजी गई है जिन्हें आपदा से बचाकर लाने का दावा किया जा रहा है। लेकिन उनमें से अधिकतर लोगों के बारे में आधी अधूरी जानकारियां दी गई हैं।

मसलन नाम के कॉलम में खाली रेणु या पवन लिख दिया गया है। उनके पिता-पति, गांव-मोहल्ला, शहर नहीं लिखा गया है। लोग परेशान हैं। कई बार इस नाम से लोगों को उम्मीद बंधती है फिर दौड़-धूप करने पर धड़ाम हो जाती है।

लोकेशन बता दो, खुद जाकर ले आएंगे
दिल्ली के जागृति एंक्लेव निवासी सर्राफा व्यवसायी चंद्रकिशोर जौहरी और उनके रिश्तेदार पुलिस अधिकारियों से बार-बार गुजारिश करते रहे कि उनके लापता भाई पवन जौहरी, भाभी मंजू और चार अन्य परिजनों की लोकेशन पता करके बता दें। वे खुद अपने संसाधन से उन्हें ले आएंगे लेकिन उन्हें दो दिन में ऐसी भी कोई जानकारी नहीं मिल पाई।

पुलिस मुख्यालय में लगी बचाए गए लोगों की सूची में पवन और उनकी पत्नी लिखा है। लेकिन ये कौन से पवन हैं इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। वैसे कंट्रोल रूम के प्रभारी सीओ पीके राय भी स्वीकार करते हैं कि आधी-अधूरी सूची से दिक्कतें तो आ रही हैं लेकिन इससे हो रहे कंफ्यूजन दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

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