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अपनों से मिलने की आस में दून एयरपोर्ट पर लोगों का जमघट

Sun, 23 Jun 2013 10:20 AM IST
देहरादून/विनोद मुसान
देहरादून/विनोद मुसान Updated Sun, 23 Jun 2013 10:20 AM IST
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people reached doon to meet with their loved ones

अचानक आई भीषण आपदा के बाद पूरे देश की नजरें इस वक्त उत्तराखंड पर लगी हैं। हर कोई जानना चाहता यहां क्या हो रहा है। देश के कोने-कोने से भूले-बिसरे लोग भी फोन पर अचानक अपनों का हाल जानने लगे हैं।

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तीन प्रमुख केंद्र चर्चा में आए
मीडिया हमेशा की तरह सशक्त प्रहरी की भूमिका निभाते हुए अपने काम में लगा है। लोगों तक अपडेट सूचनाएं पहुंचाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। आपदा के बाद रेस्क्यू आपरेशन शुरू हुआ तो दून के तीन प्रमुख केंद्र चर्चा में आ गए। सबसे पहले दून एयरपोर्ट से हेलीकाप्टरों से लोगों को बचाने का काम शुरू हुआ।
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इसके बाद सहस्रधारा हेलीपैड से हेलीकाप्टरों ने उड़ान भरी। 20 जून को बीआरओ ने यात्रा मार्गों पर पड़ने वाले दोनों नेशनल हाईवे को भी वाहनों के आने-जाने लायक बना दिया। इसके बाद वाहनों को यात्रा में फंसे वाहनों का रैला भी ऋषिकेश पहुंचने लगा।
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उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज

रेस्क्यू अभियान की शुरूआत दून एयरपोर्ट से हुई। इसलिए अपनों को सकुशल देखने की उम्मीद में सबसे अधिक लोगों की भीड़ भी यहीं जुट रही है। आइए आपको बताते हैं कैसा था शनिवार को दून एयरपोर्ट का हाल।

टूट रहा सब्र का बांध
केदारघाटी और अन्य दूसरी जगहों से आने वाली हर उड़ान के बाद लोग उम्मीद भरी नजरों से आसमान की ओर देखने लगते। हेलीकाप्टर एयरपोर्ट के अंदर से उड़ान भर और उतर रहे हैं। ऐसे में किसी को अंदर जाने की इजाजत नहीं है। सीआईएसएफ के जवानों के लिए भावनाएं कोई मायने नहीं रखती।

उनके लिए मुस्तैदी ही सबसे बड़ा धर्म है। ऐसे में अपनों के इंतजार में गेट के बाहर खड़े लोगों के पास सब्र करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। लेकिन लोग सब्र करें भी तो कब तक। सुबह से लेकर शाम तक लोगों के सब्र का बांध कई बार टूटा।

सीआईएसएफ की जगह स्थानीय पुलिस होती तो लोग शायद अपनी सीमा लांघकर एयरपोर्ट के अंदर दाखिल हो गए होते। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सके। इसके बाद एयरपोर्ट से लगे दून-ऋषिकेश हाईवे को बाधित कर उन्होंने कई बार अपने गुस्से का इजहार किया।

एक सूचना केंद्र ही बना देते
हद है! दून एयरपोर्ट से इस वक्त देश का सबसे बड़ा राहत एवं बचाव आपरेशन संचालित हो रहा है। लेकिन आसमान में फड़फड़ाते हुए जमीन पर उतरने वाला हेलीकाप्टर कहां से आ रहा है, उसमें कितने लोगों को बचा कर लाया जा रहा है।

हेलीकाप्टर एयरपोर्ट के कौन से गेट पर उतरेगा। इसकी कोई एनाउंसमेंट नहीं किया जा रहा है। ऐसे में कौन आया कौन गया, लोगों को कैसे पता चले।

न ही एयरपोर्ट पर कोई ऐसा केंद्र खुला है, जिस पर यहां देशभर से जमा भीड़ कोई सूचना प्राप्त कर सके। शासन-प्रशान के किसी जिम्मेदार अधिकारी तक की ड्यूटी भी यहां नहीं लगाई गई है।

जज्बे को सलाम
आपदा के ऐसे समय में शासन-प्रशासन क्या चीज होती है, कम से कम एयरपोर्ट के बाहर के माहौल को देखकर तो हर कोई यही कहेगा। लेकिन, सलाम उन ग्रामीणों के जज्बे को जो सेना की तरह मुस्तैद होकर आपदा पीड़ितों के परिजनों की मदद में जुटे हैं।

रानीपोखरी, भानियावाना, डोईवाला, जौलीग्रांट और अठूरवाला का हर शख्स इस वक्त यहां मुस्तैद है। खाना-पानी, वाहन जिस से जो बन पड़ रहा है, वह अपनी तरह से मदद कर रहा है। एयरपोर्ट गेट के बाहर एक राहत शिविर में खड़े नौजवान अभिनाश तिवाड़ी, अजय रावत और अनीष शाह कहते हैं, ‘भइया हम से जो बन पड़ रहा है, हम लोग कर रहे हैं।

कोफ्त होती है प्रशासन का व्यवहार देखकर, अच्छा होता प्रदेश की कमान इन नेताओं से छीनकर सेना को सौंप दी जाती।’

उमस और गर्मी ने किया बेहाल
पेड़ों की छांव न होती तो मर जाते लोग। भूखों का खाना और प्यासों को बेगानों ने पानी न पिलाया होता तो मर जाते लोग। मौसम भारी बरसात के बाद सूरज की किरणों के रूप में सितम ढा रहा है।

सूरज की तेज किरणें और उमस ने एयरपोर्ट के आसपास अपनों के लिए मंडरा रहे लोगों पर शनिवार को खूब सितम ढाया। लेकिन बावजूद पसीने से तरबतर लोग उम्मीद की आस में मोर्चे पर डटे रहे।

गुरु के सच्चे सिपाही
पिछले चार दिनों से गुरु के बंदों का एक जत्था एयरपोर्ट के बाहर लोगों को पकड़-पकड़कर पूछ रहा है, वीर जी  खाना खा लिया, बहन जी तूसी पानी पिओगे। वाहे गुरु के ये सच्चे बंदे स्वर्ण मंदिर अमतृसर पंजाब से आए हैं। जो पूरे मनोभाव से इंसानियत की सेवा में लगे हैं।

रानीपोखरी पंचायत घर में इन्होंने अपनी बड़ी रसोई बना रखी है। जहां से खाना तैयार कर न सिर्फ पहाड़ों में फंसे लोगों के लिए भेजा जा रहा है, बल्कि एयरपोर्ट के चारों और वाहनों के माध्यम से लोगों को ढूंढ-ढूंढकर खिलाया जा रहा है। सच्चे बादशाह के इन सिपाहियों को सलाम।

संयम बरते मीडिया

एयरपोर्ट पर पूरे देश के मीडिया का जमावड़ा है। आपदा में फंसा कोई मुसीबत का मारा जैसे ही गेट से बाहर निकलता, मीडिया कर्मियों की भीड़ उस पर टूट पड़ती। बुरा लग रहा है, अपनी ही बिरादरी की आलोचना कर रहा हूं। भूखा शेर भी शिकार को देखकर, उसे सांस लेने का मौका देता है। ..और यहां तो।

राष्ट्रीय मीडिया से बड़ी उम्मीदें की जाती हैं। लेकिन, यहां अपनी सीमा की सबसे ज्यादा अवहेलना वही कर रहा है। ऐसे में आसपास खड़े लोगों का यही कहना था, मीडिया को थोड़ा संयम बरतना चाहिए।

ऐसे तो बदनाम हो जाएगा उत्तराखंड
आपदा से बचकर आए कुछ तीर्थयात्रियों ने जब अपनी व्यथा बयान की तो मन खिन्न हो गया। उन पर प्रकृति ने जो कहर ढाया, उस पर तो किसी का जोर नहीं, लेकिन विपदा में फंसे इनसानों को इनसानों ने नोंचा, यह सुनकर दिल बेचैन हो गया।


किसी ने पानी की बोतल सौ रुपये में बेची तो किसी ने खाने और रहने के चार गुना दाम उसूल लिए। अपने ट्रक में ड्राइवर सीट के पीछे बैठे कुछ यात्रियों को लेकर आ रहे एक ट्रक ड्राइवर की मानें तो उससे मित्र पुलिस ने जोशीमठ से लेकर ऋषिकेश तक तीन जगह वसूली की।

..और छलक आए आंसू
मौत के मुंह से बचकर आए लोग जब अपनों से गले मिले तो संसार जैसे थम गया। बस जज्बातों का सैलाब था, गम और खुशी के आंसू थे, माहौल कुछ ऐसा बना जाता, हर दिल कहे मैं भी थोड़ा रो लूं, मैं भी थोड़ा रो लूं...।

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