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विनाश की कीमत पर हिमालय में न हो विकास कार्य

Tue, 06 Sep 2022 10:00 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Tue, 06 Sep 2022 10:00 PM IST
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Trees that protect the environment will get a protective shield
हम पौधे तो लगाते हैं लेकिन पेड़ों की सुरक्षा की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाले कई पेड़ बीमारियों से जूझते हुए दम तोड़ देते हैं। धरा के इन प्रहरियों की रक्षा का संकल्प मंगलवार को अमर उजाला हिमालय बचाओ अभियान-2022 के तहत श्रीनगर में आयोजित संवाद कार्यक्रम में लिया गया।
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एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य वन संरक्षक प्रवीण थपलियाल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र के लोगों को पर्यावरण संरक्षण के एवज में सब्सिडी मिलनी चाहिए। हिमालयी राज्यों के लिए अलग नीति तय होनी चाहिए।
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उन्होंने कहा कि सरकार को जनता से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से लेना चाहिए। साथ ही जनता को भी अपने अधिकार के प्रति गंभीर होना चाहिए। उन्होंने हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक विधायक सिर्फ इसलिए चुनाव हार गए क्योंकि वे बंदरों पर अंकुश नहीं लगा पाए। थपलियाल ने बड़ी परियोजनों के निर्माण से पूर्व और बाद में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने की पैरवी की।
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संचालन कर रहे पर्वतीय विकास शोध केेंद्र के नोडल अधिकारी डॉ. अरविंद दरमोड़ा ने कहा कि पहाड़ के लोगों को जंगलों की रक्षा के लिए रॉयल्टी मिलनी चाहिए। गैस सिलिंडरों में 80 फीसदी सब्सिडी मिलनी चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो जंगलों पर दबाव खत्म हो जाएगा।
विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास कार्य होने चाहिए लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं। परियोजनाओं का निर्माण सुनियोजित ढंग से पर्यावरण को ध्यान में रखकर होना चाहिए। हिमालय को बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। पहाड़वासियों को वनों को बचाने के लिए विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए। कार्यक्रम को विशेषज्ञों ने छात्र-छात्राओं की शंकाओं का समाधान भी किया।
विशेषज्ञों के सुझाव
व्यक्तिगत सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा पर प्रत्येक व्यक्ति को समाज पर्यावरण, जल, जंगल और जमीन जैसे विषयों के संरक्षण व संवर्धन के लिए आगे आकर अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए कार्य करना होगा। हिमालय को बचाने है तो हर शख्स को आगे आना होगा। -डॉ.जेपी भट्ट, समाजशात्री, गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर।
बड़े बांधों के बजाय रन ऑफ द रीवर बांधों का निर्माण होना चाहिए। इससे विस्थापन की समस्या आड़े नहीं आएगी। टिहरी बांध परियोजना के लिए पेड़ों की बलि ली गई। इसके बदले पेड़ सैकड़ों किलोमीटर दूर झांसी में लगाए गए। पर्यावरण के प्रति संतुलन, सामंजस्य और जागरूकता होनी चाहिए। -समीर रतूड़ी, अध्यक्ष हिमालय बचाओ आंदोलन।
रोजगार के नाम पर हिमालय क्षेत्र में किया जा रहा अतिक्रमण चिंता का विषय है। इसको रोका जाना चाहिए। व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों से पर्यावरण को बचाया जा सकता है। नदियों में जा रही गंदगी को हर हाल में रोकना होगा। पहाड़ों पर कूड़ा निस्तारण के लिए ठोस नीति तय की जानी जरूरी है। -डॉ. विजयकंात पुरोहित, वरिष्ठ वैज्ञानिक हेप्रेक श्रीनगर।
जब तक हिमालय के लोगों की आवश्यकता की पूर्ति नहीं होगी तब तक पर्यावरण नहीं बच सकता। गांव खाली हो रहे हैं, शहरों का जनसंख्या घनत्व बढ़ रहा है। ग्राम पंचायतों को और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी देनी होगी। आपदा और पर्यावरण नैतिकता राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में शामिल हो। -प्रो. एमएम सेमवाल, विभागाध्यक्ष राजनीतिशास्त्र गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर।
ग्लेशियर हमारी लाइफ लाइन हैं। ब्लैक कार्बन से ग्लेशियरों को नुकसान पहुंच रहा है। पर्यावरण को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। कूड़ा जलाने पर अंकुश लगाना चाहिए। सरकारों को शोध के लिए बजट बढ़ाने के साथ ही वैज्ञानिकों की रिपोर्ट का भी पालन करना होगा। -डॉ. आलोक सागर गौतम, हिमालय के मौसम पर शोध कर रहे भौतिकशास्त्री।
छात्रों के सुझाव
प्लास्टिक के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। लेकिन लगभग हर सामान प्लास्टिक की पैकिंग में आ रहा है। सरकार को इस पर रोक लगानी चाहिए। सिर्फ जनता पर प्रतिबंध थोपकर कुछ नहीं होगा। लोग अपनी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं लेकन सरकार काम नहीं करती है। -शिवानी पांडेय, शोध छात्रा, राजनीतिशास्त्र।
हिमालय और हिंदुकश क्षेत्र में 50,000 ग्लेशियर हैं लेकिन हम सिर्फ 50 का ही अध्ययन कर पाए हैं। सभी का अध्ययन होना चाहिए। ऑलवेदर रोड हो या रेल परियोजना इसके नुकसान के प्रति पर्यावरणविद भी चुप्पी साधे बैठे हुए हैं। -अंकित उछोली, शोध छात्र, समाजशास्त्र।
हिमालय व पर्यावरण को बचाने के लिए लोगों को विकल्प तैयार करने होंगे। पहाड़ से पलायन रोकने के लिए रोजगार का सृजन करना होगा। विश्वविद्यालय को भी इस संबंध में पहल करनी होगी। -सूरज रावत, छात्र बीएससी द्वितीय वर्ष।
कार्बन उत्सर्जन के लिए मनुष्य जिम्मेदार है। पेट्रोल-डीजल के बजाय इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना चाहिए। स्कूलों और विश्वविद्यालयों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में बस सेवा शुरू करनी चाहिए। जिससे छात्र अपने वाहनों में आने के बजाय बसों से आएं। -सूरज शर्मा, छात्र एमए।
ऑल वेदर रोड परियोजना से फायदा तो मिला है लेकिन इससे जल, जमीन और पर्यावरण का बहुत नुकसान हुआ है। संवेदनशीलता देखते हुए योजनाओं का क्रियान्वयन उचित ढंग से हो। -अमन पंत, छात्र एमए।
स्मार्ट सिटी के बजाय स्मार्ट विलेज की धारणा पर काम हो। नीति निर्माण और क्रियान्वयन में गैप है। इसको भरा जाए। विकास योजनाओं में पर्यावरण की चिंता को शामिल किया जाना चाहिए। -दीपक उपाध्याय, छात्र एमए।

हिमालय संकल्प
पॉलीटेक्नीक से शुरू होगा अभियान
हर साल पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधे तो रोपे जाते हैं लेकिन पेड़ों के संरक्षण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। कई बार दीमक या फंगस की वजह से दशकों पुराने पेड़ों को नुकसान पहुंचता है। इन्हीं पेड़ों को बचाने का संकल्प अमर उजाला हिमालय बचाओ अभियान के तहत लिया गया। कवकों को नष्ट करने वाली दवा का पेड़ के तनों पर चूने के साथ लेपन किया जाएगा। इस अभियान की शुरुआत राजकीय पॉलीटेक्नीक परिसर श्रीनगर से की जाएगी। पॉलीटेक्नीक परिसर में उगे पेड़ों पर संस्थान के शिक्षकों व छात्र-छात्राओं के साथ स्टॉप टीयर्स संस्था के सदस्य चूने का लेपन करेंगे। इस मौके पर गढ़वाल विश्वविद्यालय के वानिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. जीतेंद्र बुटोला छात्र-छात्राओं को इसका फायदा बताएंगे।
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