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छोटे कांडा में दिखा उत्साह, बड़ा कांडा आज
Pauri
Updated Thu, 15 Nov 2012 12:00 PM IST
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श्रीनगर। बुधवार को देहलचौरी स्थिति मजीन कांडा मेले यानी छोटे कांडा के लिए श्रद्घालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। मंजूघोषेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए हजारोें लोग मंदिर में जुटे। गोवर्धन पूजा के दिन छोटा कांडा मेले में दोपहर ठीक दो बजे से ही माता मंजू तथा भगवान शिव के मंदिर में पारंपरिक रूप से निशान चढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ, जो सूर्यास्त तक चलता रहा। समाचार भेजे जाने तक मंदिर में 16 निशान चढ़ाए जाने की सूचना मिली थी।
श्रीनगर से लगभग 18 किमी. दूर देहलचौरी स्थित मंजूघोषेश्वर महादेव में दीपावली के ठीक दूसरे दिन से आयोजित किया जाता है। इस मौके पर आस-पास के छह दर्जन से अधिक गांवों के ग्रामीणों के साथ ही प्रदेश तथा देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंचते हैं। पहले यहां पशु बलि होती थी, लेकिन अब यह बंद हो गई है। मजीन कांडा सेवा समिति के माध्यम से प्रतिवर्ष की बांटी जाने वाली झंडियों में इस वर्ष इजाफा हुआ है। गत वर्ष मंदिर में 29 छत्र चढ़ाए गए थे, जबकि इस वर्ष कुल 47 झंडियां मेला समिति ने वितरित की हैं। मेला समिति के अध्यक्ष कमलादत्त भट्ट ने इस वर्ष कम से कम 50 निशान चढ़ाए जाने की उम्मीद है। निशान चढ़ाने का सिलसिला छोटे कांडा से शुरू हुआ है, जो कि बृहस्पतिवार को बडे़ कांडा के दौरान भी जारी रहेगा। कांडा गांव से ठीक दो बजे डोली आगमन के साथ ही बैंज्वाड़ी व तैला गांव से निशानों को चढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ। मंदिर तक पहुंच रहे निशानों के साथ विभिन्न गांवों से पहुंचे छत्र भी शामिल थे, जो माता मंजूघोष से अपने-अपने गांवों व परिवारों के सुख-समृद्धि की कामना के लिए पहुंचे। इस मौके पर मजीन कांडा सेवा समिति कमलादत्त भट्ट, उपाध्यक्ष राम प्रसाद भट्ट, सचिव कैलाश भट्ट, प्रेमलाल भट्ट आदि ने मेलार्थियों का मार्गदर्शन किया। पहले दिन कफोली, तैड़ा, छोटी कमेड़ी, लुलेटा, स्वाडू, कमलगढ़, बेलकंडी, रामपुर सहित डेढ़ दर्जन गांवों ने निशान चढ़ाए। इस मौके पर एसडीएम रजा अब्बास, थानाध्यक्ष अनिल कुमार जोशी, तहसीलदार कुसुम चौहान, एसओ महिला थाना जानकी भंडारी, आठ महिला कांस्टेबल, एक प्लाटून पीएसी के साथ ही 60 अन्य पुलिसकर्मी मौके पर तैनात रहे।
यहां स्वर्ग की अप्सरा मंजू ने कमाया था पुण्य
श्रीनगर। कांडा मेला के नाम से विख्यात मंजुघोषेश्वर महादेव मजीन में एक साथ श्रद्धालुओं को शिव, महाकाली व भगवती के आशीर्वाद का पुण्य प्राप्त होता है। किंवदंती है कि स्वर्ग की अप्सरा मंजू ने अपने क्षीण हुए पुण्यों को प्राप्त करने के लिए यहीं पर शिव की अराधना की थी। तपस्या में लीन अप्सरा मंजू को आघात पहुंचाने के लिए प्रकट हुए कोलासुर राक्षस का वध भी महाकाली ने इसी स्थान पर किया। इसके अलावा जब शिव सती के भस्म हुए शरीर को लेकर हिमालय में विचरण कर रहे थे तो यहां पर सती पार्वती के हाथ की छोटी उंगली गिरी थी। तब से ही इसके नाम के साथ मजीन पड़ा और यह सिद्धपीठ बना। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु मंजुघोष यात्रा कर इस स्थान पर आता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
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श्रीनगर तसहील के अंतर्गत रावतस्यूं पट्टी के देहलचौरी से लगभग दो किमी. दूर पहाड़ी पर मंजुघोषेश्वर महादेव मजीन कांडा मंदिर स्थित है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार स्वर्ग की अप्सरा मंजू के पुण्य किसी कारण क्षीण हो गए थे। दुबारा पुण्य प्राप्त करने के लिए वह उक्त स्थल पर शिव की अराधना में तल्लीन हो गई। तत्कालीन समय में इसी क्षेत्र में कोलासुर राक्षस का साम्राज्य भी था। तपस्या में लीन अप्सरा के सौंदर्य पर मोहित होकर उसके मन में उसे पाने की इच्छा जागृत हो गई। एक दिन जब अप्सरा तपस्या स्थल के आस-पास भ्रमण कर रही थी तो कोलासुर व अन्य राक्षसों ने भैंस व बकरियों का रूप धारण कर लिया। कोलासुर नर भैंसे के रूप में अप्सरा के पास जा कर उस पर झपट पड़ा। शिव भगवान इस घटना को अपनी माया से देख रहे थे। अप्सरा पर संकट देख शिव महाकाली को कोलासुर राक्षस का वध करने का आदेश देते हैं। जिस पर महाकाली भैंस व बकरी रूप लिए राक्षसों का वध कर देती है। तब से यह स्थान प्रसिद्ध सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है।
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श्रीनगर से लगभग 18 किमी. दूर देहलचौरी स्थित मंजूघोषेश्वर महादेव में दीपावली के ठीक दूसरे दिन से आयोजित किया जाता है। इस मौके पर आस-पास के छह दर्जन से अधिक गांवों के ग्रामीणों के साथ ही प्रदेश तथा देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंचते हैं। पहले यहां पशु बलि होती थी, लेकिन अब यह बंद हो गई है। मजीन कांडा सेवा समिति के माध्यम से प्रतिवर्ष की बांटी जाने वाली झंडियों में इस वर्ष इजाफा हुआ है। गत वर्ष मंदिर में 29 छत्र चढ़ाए गए थे, जबकि इस वर्ष कुल 47 झंडियां मेला समिति ने वितरित की हैं। मेला समिति के अध्यक्ष कमलादत्त भट्ट ने इस वर्ष कम से कम 50 निशान चढ़ाए जाने की उम्मीद है। निशान चढ़ाने का सिलसिला छोटे कांडा से शुरू हुआ है, जो कि बृहस्पतिवार को बडे़ कांडा के दौरान भी जारी रहेगा। कांडा गांव से ठीक दो बजे डोली आगमन के साथ ही बैंज्वाड़ी व तैला गांव से निशानों को चढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ। मंदिर तक पहुंच रहे निशानों के साथ विभिन्न गांवों से पहुंचे छत्र भी शामिल थे, जो माता मंजूघोष से अपने-अपने गांवों व परिवारों के सुख-समृद्धि की कामना के लिए पहुंचे। इस मौके पर मजीन कांडा सेवा समिति कमलादत्त भट्ट, उपाध्यक्ष राम प्रसाद भट्ट, सचिव कैलाश भट्ट, प्रेमलाल भट्ट आदि ने मेलार्थियों का मार्गदर्शन किया। पहले दिन कफोली, तैड़ा, छोटी कमेड़ी, लुलेटा, स्वाडू, कमलगढ़, बेलकंडी, रामपुर सहित डेढ़ दर्जन गांवों ने निशान चढ़ाए। इस मौके पर एसडीएम रजा अब्बास, थानाध्यक्ष अनिल कुमार जोशी, तहसीलदार कुसुम चौहान, एसओ महिला थाना जानकी भंडारी, आठ महिला कांस्टेबल, एक प्लाटून पीएसी के साथ ही 60 अन्य पुलिसकर्मी मौके पर तैनात रहे।
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यहां स्वर्ग की अप्सरा मंजू ने कमाया था पुण्य
श्रीनगर। कांडा मेला के नाम से विख्यात मंजुघोषेश्वर महादेव मजीन में एक साथ श्रद्धालुओं को शिव, महाकाली व भगवती के आशीर्वाद का पुण्य प्राप्त होता है। किंवदंती है कि स्वर्ग की अप्सरा मंजू ने अपने क्षीण हुए पुण्यों को प्राप्त करने के लिए यहीं पर शिव की अराधना की थी। तपस्या में लीन अप्सरा मंजू को आघात पहुंचाने के लिए प्रकट हुए कोलासुर राक्षस का वध भी महाकाली ने इसी स्थान पर किया। इसके अलावा जब शिव सती के भस्म हुए शरीर को लेकर हिमालय में विचरण कर रहे थे तो यहां पर सती पार्वती के हाथ की छोटी उंगली गिरी थी। तब से ही इसके नाम के साथ मजीन पड़ा और यह सिद्धपीठ बना। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु मंजुघोष यात्रा कर इस स्थान पर आता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
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श्रीनगर तसहील के अंतर्गत रावतस्यूं पट्टी के देहलचौरी से लगभग दो किमी. दूर पहाड़ी पर मंजुघोषेश्वर महादेव मजीन कांडा मंदिर स्थित है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार स्वर्ग की अप्सरा मंजू के पुण्य किसी कारण क्षीण हो गए थे। दुबारा पुण्य प्राप्त करने के लिए वह उक्त स्थल पर शिव की अराधना में तल्लीन हो गई। तत्कालीन समय में इसी क्षेत्र में कोलासुर राक्षस का साम्राज्य भी था। तपस्या में लीन अप्सरा के सौंदर्य पर मोहित होकर उसके मन में उसे पाने की इच्छा जागृत हो गई। एक दिन जब अप्सरा तपस्या स्थल के आस-पास भ्रमण कर रही थी तो कोलासुर व अन्य राक्षसों ने भैंस व बकरियों का रूप धारण कर लिया। कोलासुर नर भैंसे के रूप में अप्सरा के पास जा कर उस पर झपट पड़ा। शिव भगवान इस घटना को अपनी माया से देख रहे थे। अप्सरा पर संकट देख शिव महाकाली को कोलासुर राक्षस का वध करने का आदेश देते हैं। जिस पर महाकाली भैंस व बकरी रूप लिए राक्षसों का वध कर देती है। तब से यह स्थान प्रसिद्ध सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है।