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करवट बदलती दिख रही अब उत्तराखंड की राजनीति

Mon, 25 Apr 2016 12:28 AM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 25 Apr 2016 12:28 AM IST
सार

  • स्थायी सरकार की नहीं, अब कार्यवाहक बनने की लड़ाई
  • कांग्रेस : सरकार बनाने के बाद विधानसभा भंग कर चुनाव घोषित कर दिए जाएं
  • भाजपा : भाजपा सरकार में चुनाव हों या राज्यपाल शासन में हो चुनावी शंखनाद

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new turn in Uttarakhand politics.
राजनी‌ति - फोटो : demo

विस्तार

करीब डेढ़ महीने बाद अब प्रदेश की राजनीति करवट बदलती दिख रही है। भाजपा और कांग्रेस को सरकार की चाह कम और कार्यवाहक सरकार बनकर अपने शासनकाल में चुनाव कराने की कोशिश ज्यादा है। 

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इस मामले में दोनों दलों की मनोस्थिति एक समान दिख रही है। दोनों के ही रणनीतिकार मान रहे हैं कि किसी तरह से सरकार का गठन कर कुछ दिन बाद विधानसभा भंग करके खुद के राज में विधानसभा चुनाव करा लिए जाएं। 
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एक-दूसरे विकल्प पर भी काम कर रही भाजपा
भाजपा एक-दूसरे विकल्प पर भी काम कर रही है। यदि उसकी (भाजपा) सरकार नहीं बनती तो राज्यपाल शासन में चुनाव हों। क्योंकि यदि समय पर भी चुनाव होते हैं तो भी सीमित समय है। 
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विगत 21 अप्रैल को हाईकोर्ट ने जब राष्ट्रपति शासन खारिज किया तो बगैर किसी लिखित आदेश के हरीश रावत कुर्सी पर विराजमान हो गए। समझा गया कि अब राजनीतिक उठापटक बंद हो जाएगी, लेकिन यह आभास कम ही लोगो को था कि यह जल्दबाजी खेल भी बिगाड़ सकती है। 

24 घंटे के भीतर ही हरीश को एक बार फिर सत्ता बेदखल

new turn in Uttarakhand politics.
हरीश रावत

वही हुआ, सर्वोच्च न्यायालय ने 24 घंटे के भीतर ही हरीश को एक बार फिर सत्ता से बेदखल कर दिया। दूसरी तरफ डेढ़ महीने से पीडीएफ विधायकों को साधने में लगी भाजपा भी असफल रही। उम्मीद थी कि कांग्रेस में जो सतपाल महाराज समर्थक विधायक हैं, वो भाजपा के साथ आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वित्त विनियोग विधेयक के दौरान हरीश रावत मुगालते में रहे और सरकार गिर गई, दूसरी बार गद्दी संभालने की जल्दबाजी ने खेल बिगाड़ दिया। उधर, संख्याबल बढ़ाने की भाजपा की रणनीति महीने भर में कोई चमत्कार नहीं कर सकी। 

कांग्रेस कैंप में खलबली
अब दोनों (कांग्रेस व भाजपा) ही दलों की मनोदशा एक जैसी हो गई है। भाजपा की कोशिश है कि सरकार उनकी बने या न बने, लेकिन हरीश रावत की सरकार में चुनाव नहीं होने चाहिए। उधर, कांग्रेस कैंप में इस बात की खलबली है कि भाजपा की सरकार बनी और उसके शासनकाल में चुनाव हुए तो नुकसान हो सकता है। 

हालांकि भाजपा के पास एक और विकल्प है। वह अपनी सरकार के राज में चुनाव कराने में यदि सफल नहीं होती तो फिर राज्यपाल शासन में चुनाव कराने पर जोर रहेगा।

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