ना बचाएं, क्या भूखे मर जाएं: खेती पर जंगली जानवरों की टेढ़ी नजर, शहरों में खड़े हो गए कंक्रीट के ‘जंगल’
उत्तराखंड में पहाड़ से लेकर तराई तक खेती पर जंगली जानवरों की टेढ़ी नजर से किसानों का मोह भंग होने लगा है। खेतों में बीज बोते ही बंदरों और सुअरों का झुंड टूट पड़ता है। किसानों का कहना है कि ऐसे में किया भी क्या जाए।
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विस्तार
फसल को जंगली जानवरों के बर्बाद कर देने, मंडियां उपलब्ध नहीं होने, बारिश पर ही फसल के निर्भर रहने जैसी तमाम दिक्कतों की वजह से लोग खेती-किसानी छोड़ने के लिए मजबूर हैं। इन सब परेशानियों के चलते गांवों से नगरों में बसने की होड़ से शहरी क्षेत्रों में भी खेती का रकबा घट रहा है।
नतीजतन, पर्वतीय क्षेत्र के खेत जहां बंजर हो गए हैं और उनमें घास और झाड़ियां उग आईं हैं, वहीं शहर के खेतों में कंक्रीट के जंगल उग गए हैं। साल दर साल खेती की जमीन भी दैवीय आपदा की भेंट चढ़ती रही है और मानसून में नदियों के किनारे की जमीन बाढ़ के पानी से तबाह हो जाती है। पिछले 23 सालों में खेती का रकबा काफी घट गया है।
मडुवे का भी घटा रकबा
- 3842 रुपये क्विंटल दाम होने के बावजूद प्रदेश में चार साल में मडुवे की खेती में 17 प्रतिशत और उत्पादन में 12 प्रतिशत कमी आई है।
- 2019 से प्रदेश में मडुवे की खेती के रकबे में 16036 हेक्टेयर (17.50%) और उत्पादन में 16445 मीट्रिक टन (12.65 प्रतिशत) की कमी आई है।
- 2019 में 91584 हेक्टेयर में खेती हुई और 129994 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। - 2022 में 75548 हेक्टेयर खेती में 113549 मीट्रिक टन उपज हुई।
- बागेश्वर जिले में मडुवे की खेती का रकबा बढ़ा है। प्रभारी मुख्य कृषि अधिकारी गीतांजलि बंगारी बतातीं हैं कि जिले में 6000 हेक्टेयर में मडुवे की खेती की जाती है। दो साल पहले तक करीब 4000 हेक्टेयर में मडुवा बोया जाता था।
नैनीताल
- जिले में 24000 हेक्टेयर असिंचित तो 26000 हेक्टेयर सिंचित भूमि। ओखलकांडा, रामगढ़, धारी, बेतालघाट के ग्रामीण जंगली जनवरों से होने वाले नुकसान से पीड़ित।
- नैनीताल जनपद में 2010-11 में खाद्यान्न उत्पादन एक लाख 13 हजार 202 मीट्रिक टन था जो 2020-21 में 1 लाख 36 हजार 572 मीट्रिक टन हो गया।
- उत्पादकता भी 23.45 से बढ़कर 31.56 कुंतल प्रति हेक्टेयर हुई है। 2010-11 में 44789 हेक्टेयर में फसल बोई गई थी जो 2020-21 में घटकर 38780 हेक्टेयर रह गई है।
जानवरों से सुरक्षा के लिए खेत की तारबाड़ की जा रही है। 1.90 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। - डॉ. वीके यादव, मुख्य कृषि अधिकारी नैनीताल।
ऊधमसिंह नगर
- आयोग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य बनने के बाद से अब तक 10,000 हेक्टेयर कृषि भूमि शहरीकरण की भेंट चढ़ चुकी है।
- धान का कटोरा कहे जाने वाले यूएस नगर में 1,45,000 हेक्टेयर भूमि में खेती की जा रही है। वहीं, राज्य बनने से अब तक 10 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि कम हो गई है।
- पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक जिले में छोटे किसान अधिक हो गए हैं। इनके पास जितनी जोत है, उसमें कृषि पैदावार से आजीविका चलाने में दिक्कत हो रही है।
- वर्ष 2003 के बाद से जिले में औद्योगिक क्षेत्र के विकास के बाद क्षेत्र में दरों में वृद्धि हुई और इसके चलते खेती की भूमि का व्यावसायिक उपयोग होने लगा।
- औद्योगिकीकरण के साथ मिट्टी की उर्वरता भी कम हो गई है। फसल की पैदावार कम हुई है और किसानों को व्यवसाय बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा।
- 54.1 प्रतिशत किसान दो हेक्टेयर से कम कृषि भूमि पर कर रहे हैं खेती। 19.5 प्रतिशत किसान चार हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं। सिर्फ 25.9 प्रतिशत
- किसान चार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर खेती कर रहे हैं। 50,000 हेक्टेयर भूमि पर दो बार धान और 95,000 हेक्टेयर भूमि पर गेहूं उगाया जाता है।
अल्मोड़ा
- 23 वर्ष में जिले में 27625 हेक्टेयर घट गया खेती, औद्यानिकी का रकबा। वर्ष 2000 में 113000 हेक्टेयर में 95 हजार किसान खेती और सब्जी उत्पादन करते थे जो अब सिमटकर 85375 हेक्टेयर रह गया है।
- जिले में किसानों की संख्या बढ़कर 1.2 लाख पहुंची, राज्य गठन के बाद फसल का उत्पादन भी घटा है। कृषि विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 तक रवि और खरीफ सीजन में धान, मक्का, मडुवा, मादिरा, गहत, उड़द, सोयाबीन, गेहूं, जौ, मसूर सहित अन्य फसल का औसतन 12 लाख क्विंटल उत्पादन होता था जो वर्तमान में 10 लाख क्विंटल है।
- अल्मोड़ा में फल पट्टियां भी विकसित नहीं हो सकी हैं। उद्यान विभाग ने एक वर्ष पूर्व ही एप्पल मिशन योजना के तहत चार हेक्टेयर क्षेत्र में सेब बागान स्थापित करने की पहल शुरू की, इससे 14 किसानों को जोड़ा गया है।
- सल्ट, स्याल्दे, द्वाराहाट, लमगड़ा, सोमेश्वर, दन्या क्षेत्र में बंदरों के साथ ही जंगली सुअरों का आतंक है, इससे निपटने के उपाय न तो विभागों के पास हैं और न ही शासन स्तर पर हुए हैं।
- 95 गांवों में पलायन से खेती पूरी तरह बंद हो गई ।
- हवालबाग में खोला गया एकमात्र कोल्ड स्टोर बंद है, इससे किसान अपने उत्पादों को सुरक्षित नहीं रख पाते। उत्पादों को हल्द्वानी मंडी पहुंचाना मुश्किल है। सब्जी और फलों को सुरक्षित न रख पाने और बाजार उपलब्ध न होने से किसान इससे मुंह मोड़ रहे हैं।
पिथौरागढ़
- वर्ष 2001 में पिथौरागढ़ में कृषि भूमि का क्षेत्रफल 81165 हेक्टेयर था जो वर्तमान में घटकर 65531 हेक्टेयर ही रह गया है।
- कृषि विभाग के अनुसार सीमांत जिले में 73744 किसान 42000 हेक्टेयर भूमि में खेती करते हैं। इसमें से महज 3200 भूमि हेक्टेयर ही सिंचित है।
बागेश्वर
- कभी धान के कटोरे के रूप में जाने जाने वाले जिला मुख्यालय के मंडलसेरा, बिलौनासेरा आज कंकरीट के जंगल में तब्दील हो रहे हैं।
- जिले में 15-20 साल पहले तीस हजार हेक्टेयर से अधिक भूभाग पर खेती होती थी, आज खेती का रकबा घटकर 2424 हेक्टेयर रह गया है।
- रामगंगा के कटाव से पिथौरागढ़ जिले की सीमा से सटे नामतीचेटाबगड़ क्षेत्र, सरयू के कटाव से कपकोट के ऐठाण आदि क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि नदी की भेंट चढ़ रही है।
चकबंदी पहाड़ के लिए होगी फायदेमंद
खेती को बढ़ावा देने के लिए बरसात के पानी का संरक्षण करने को टैंक बनाए जाने चाहिए। उद्यान और सब्जी उत्पादन से गांवों के युवाओं को रोजगार से जोड़ा जा सकता है। सीमांत जिले में अखरोट, बादाम, सेब, कीवी, नाशपाती के साथ टमाटर, आलू, अदरक आदि का अच्छा उत्पादन हो सकता है। सरकार भी बागवानी, औद्यानिकी को बढ़ावा देने के लिए पॉलीहाउस, बूंद-बूंद सिंचाई, तारबाड़ के साथ ही कई योजनाएं चला रही है। चकबंदी पहाड़ के लिए बेहद फायदेमंद होगी। -डॉ. जितेंद्र क्वात्रा, पंतनगर कृषि प्राध्यापक पंत विवि
चंपावत
- चंपावत जिले में 41 प्रतिशत कम हो गई खेती।
- शुरुआती दौर में 28992 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती थी, जो अब 16975 हेक्टेयर में सिमट गई है, उत्पादन में 19 फीसदी गिरावट आई है।
- पहाड़ की 70 प्रतिशत से अधिक खेती बारिश पर निर्भर। 16975 हेक्टेयर के सापेक्ष 4511 हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई की सुविधा।
उठाए जा रहे हैं ये कदम
- चंपावत जिले में सामूहिक खेती के जरिये पहल की जा रही है। सहकारिता विभाग की ओर से 14 समितियां अदरक की सामूहिक खेती कर रही हैं।
- परंपरागत कृषि विकास योजना के जरिये जैविक खेती के लिए 1012 हेक्टेयर क्षेत्र में 50 क्लस्टर बनाए गए हैं।
- उद्यान पौधशालाओं को बेहतर कर आलू, कीवी, सेब, सिटरस फल के बीज और पौधों को तैयार कर रहा है।
- चंपावत के मुड़ियानी की पौधशाला को उद्यान के साथ हार्टी टूरिज्म के रूप में भी विकसित करने की पहल।
चंपावत जिले में खेती के रकबा को बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। परंपरागत फसल के अलावा मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। खेती को मुनाफे से जोड़ने के लिए खरीद केंद्र बनाने के साथ ही सहकारिता विभाग के जरिये किसानों की फसल को क्रय किया जा रहा है। -गोपाल सिंह भंडारी, मुख्य कृषि अधिकारी, चंपावत।
जिले में किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार योजनाओं का संचालन कर रही है। किसानों को मोटे अनाज के उत्पादन और परंपरागत खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। -गीतांजलि बंगारी, प्रभारी मुख्य कृषि अधिकारी
जिले में कीवी का बेहतर उत्पादन हो रहा है। विभाग सेब उत्पादन पर भी ध्यान दे रहा है। फल पट्टियां विकसित की जा रही हैं। युवाओं को रोजगार देने की दिशा में काम किया जा रहा है। - आरके सिंह, जिला उद्यानअधिकारी
पहाड़ी इलाकों में चकबंदी की मांग लंबे समय से की जा रही है। छितरे खेतों के कारण पहाड़ के लोगों को खेती का लाभ नहीं मिल पा रहा है। चकबंदी लागू करने के लिए पिछले 23 वर्षों के दौरान लगभग हर सरकार के कार्यकाल में चर्चा से लेकर कवायद तक हुई लेकिन शासन स्तर से पहाड़ पर चकबंदी लागू करने के आदेश नहीं हुए। पिछले दिनों मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में चकबंदी कराने का एलान किया है। हालांकि जानकारों की माने तो इस दिशा में सरकार का कदम आसान नहीं होगा। क्योंकि जो खेत उपजाऊ और बिखरे हुए हैं उनके एवज में कोई बंजर खेत लेने के लिए कैसे सहमत होगा।
सवाल संगठन के अध्यक्ष रमेश पांडेय कृषक कहते हैं कि पहाड़ में चकबंदी कृषि के क्षेत्र में क्रांति ला सकती है। रमाड़ी के प्रगतिशील काश्तकार बलवंत सिंह कार्की, शामा के प्रगतिशील काश्तकार भवान सिंह कोरंगा, लीती की प्रगतिशील काश्तकार धना देवी कोरंगा चकबंदी को खेती को बचाने का बेहतर विकल्प मानते हैं।