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Kabootri Devi: कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी ने लोकगीतों को दिलाई नई पहचान, आकाशवाणी के लिए भी गाए गीत
Wed, 18 Oct 2023 05:08 PM IST
हीरा मेहरा
मयंक जोशी, संवाद
मयंक जोशी, संवाद
Published by: हीरा मेहरा
Updated Wed, 18 Oct 2023 05:08 PM IST
सार
शारदीय नवरात्र के अवसर पर अमर उजाला अपने पाठकों को कुमाऊं की उन महिलाओं से रूबरू करा रहा है, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। पढ़िए अमर उजाला की विशेष सीरीज...
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कबूतरी देवी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पहाड़ ठंडो पानी, सुण कति मीठी वाणी, छोड़नि नि लागनी... उत्तराखंडी लोकजीवन की सादगी और सौंदर्य को बयां करता ये लोकगीत जब 70-80 के दशक में लखनऊ और नजीबाबाद आकाशवाणी केंद्र से गूंजा तो हर कोई लोकगायिका कबूतरी देवी की खनकदार आवाज का मुरीद हो गया।
ऊंचे स्वर और सधी हुई आवाज में जिस बारीकी से कबूतरी देवी ने कुमाऊंनी लोकविधाओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उसी अंदाज में उन्होंने गजल और हिंदी गायन में भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा। यही वजह है कि उन्हें कुमाऊं की बेगम अख्तर भी कहा जाता था। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी देवी ने आकाशवाणी के लिए 100 से अधिक गीत गाए।
जीवन के आखिरी पड़ाव में उत्तराखंड के संस्कृति विभाग ने उन्हें पेंशन भी दी। सांस की बीमारी के चलते पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। कबूतरी देवी के जाने के बाद कुमाऊंनी लोकगायिकी में खाली स्थान छूट गया है जिसकी भरपाई उनके गाए गए लोकगीत ही कर सकते हैं।
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चंपावत के मिरासी (लोकगायक) परिवार में जन्मी कबूतरी को बचपन से ही उनकी मां देवकी देवी और पिता रामकाली ने स्वर साधने के साथ वाद्य यंत्र बजाने की तालीम दी। 14 साल की उम्र में उनकी शादी पिथौरागढ़ जिले के क्वीतड़ गांव के दीवानी राम से हुई। पति के मार्गदर्शन में उन्होंने आकाशवाणी का सफर तय किया। उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ, नजीबाबाद और बंबई आर्किटेक्चर से भी गीत गाए। तब हर गाने में कबूतरी देवी को 50 रुपये मिलते थे।
दिसंबर 1984 में पति की मृत्यु के बाद कबूतरी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बाद के दो दशक बहुत मुश्किलों भरे गुजरे। परिवार के पालन-पोषण के लिए कबूतरी देवी को दिहाड़ी मजदूरी तक करनी पड़ी। 2002 से उनकी प्रतिभा को सम्मान मिलना शुरू हुआ। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर विभिन्न मंचों में सम्मानित किया गया।
जीवन-परिचय
कबूतरी देवी के प्रसिद्ध लोकगीत
लोकविधाओं में निपुण थीं कबूतरी देवी
कबूतरी देवी ऋतु रैण, मंगल गीत, भगनौल, न्यौली, जागर, घनेली, झोड़ा, चांचरी आदि लोकविधाओं में पारंगत थीं। उनके गीतों में मुख्य रूप से पर्वतीय सौंदर्य, ठेठ और सादा पहाड़ी जीवन, प्रवासियों का दर्द, कृषि जीवन, पर्यावरण आदि की झलक देखने को मिलती थी। वह अपने पति के रचे गीत गाती थीं।
बेटी और नाती गायकी की परम्परा को बढ़ा रहे आगे
कबूतरी देवी की बेटी हेमंती देवी और नाती पवनदीप राजन गायन की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। द वॉइस इंडिया कार्यक्रम में नंबर एक का खिताब पाने के बाद पवनदीप राजन कई नई म्यूजिक एल्बम में नजर आ चुके हैं। वहीं उनकी बेटी हेमंती देवी ने हाल ही में कबूतरी देवी का गीत आज पानी जों जों, भोल पानी जों जों गीत गाया है। हेमंती देवी लोककला की दुनिया में संघर्ष कर रही हैं। उनके पास काम की कमी है। सरकारी स्तर पर हेमंती देवी जैसे लोक कलाकारों को आगे बढ़ाने के लिए कदम उठाये जाने की दरकार है।
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ऊंचे स्वर और सधी हुई आवाज में जिस बारीकी से कबूतरी देवी ने कुमाऊंनी लोकविधाओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उसी अंदाज में उन्होंने गजल और हिंदी गायन में भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा। यही वजह है कि उन्हें कुमाऊं की बेगम अख्तर भी कहा जाता था। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी देवी ने आकाशवाणी के लिए 100 से अधिक गीत गाए।
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जीवन के आखिरी पड़ाव में उत्तराखंड के संस्कृति विभाग ने उन्हें पेंशन भी दी। सांस की बीमारी के चलते पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। कबूतरी देवी के जाने के बाद कुमाऊंनी लोकगायिकी में खाली स्थान छूट गया है जिसकी भरपाई उनके गाए गए लोकगीत ही कर सकते हैं।
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चंपावत के मिरासी (लोकगायक) परिवार में जन्मी कबूतरी को बचपन से ही उनकी मां देवकी देवी और पिता रामकाली ने स्वर साधने के साथ वाद्य यंत्र बजाने की तालीम दी। 14 साल की उम्र में उनकी शादी पिथौरागढ़ जिले के क्वीतड़ गांव के दीवानी राम से हुई। पति के मार्गदर्शन में उन्होंने आकाशवाणी का सफर तय किया। उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ, नजीबाबाद और बंबई आर्किटेक्चर से भी गीत गाए। तब हर गाने में कबूतरी देवी को 50 रुपये मिलते थे।
दिसंबर 1984 में पति की मृत्यु के बाद कबूतरी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बाद के दो दशक बहुत मुश्किलों भरे गुजरे। परिवार के पालन-पोषण के लिए कबूतरी देवी को दिहाड़ी मजदूरी तक करनी पड़ी। 2002 से उनकी प्रतिभा को सम्मान मिलना शुरू हुआ। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर विभिन्न मंचों में सम्मानित किया गया।
जीवन-परिचय
- 1945 को चंपावत के लेटी गांव में जन्म।
- 1959 में लोकगायक वादक दीवानी राम के साथ 14 वर्ष की उम्र में विवाह।
- 25 मई 1979 को आकाशवाणी लखनऊ से पहली बार प्रसारण।
- 30 दिसंबर 1984 को पति दीवानी राम का निधन।
- 7 जुलाई 2018 को सांस की बीमारी के कारण परलोक सिधार गईं।
कबूतरी देवी के प्रसिद्ध लोकगीत
- जो भागि जियलो गोरी नौ ऋतु सुणलो
- आज पाणि झौं-झौं, भोल पाणि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला
- पहाड़ों को ठंडो पाणि, कि भलि मीठी बाणी
- हिमाला ह्यूं को फूलो, पातल क्वैराल फूलो, पहाड़ न्है जूनो
- बाट में दुकान हाली, बटुआ लूटी खान्या, यो पराणि हवा जैसी, भोल त मरि जाणा।
लोकविधाओं में निपुण थीं कबूतरी देवी
कबूतरी देवी ऋतु रैण, मंगल गीत, भगनौल, न्यौली, जागर, घनेली, झोड़ा, चांचरी आदि लोकविधाओं में पारंगत थीं। उनके गीतों में मुख्य रूप से पर्वतीय सौंदर्य, ठेठ और सादा पहाड़ी जीवन, प्रवासियों का दर्द, कृषि जीवन, पर्यावरण आदि की झलक देखने को मिलती थी। वह अपने पति के रचे गीत गाती थीं।
बेटी और नाती गायकी की परम्परा को बढ़ा रहे आगे
कबूतरी देवी की बेटी हेमंती देवी और नाती पवनदीप राजन गायन की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। द वॉइस इंडिया कार्यक्रम में नंबर एक का खिताब पाने के बाद पवनदीप राजन कई नई म्यूजिक एल्बम में नजर आ चुके हैं। वहीं उनकी बेटी हेमंती देवी ने हाल ही में कबूतरी देवी का गीत आज पानी जों जों, भोल पानी जों जों गीत गाया है। हेमंती देवी लोककला की दुनिया में संघर्ष कर रही हैं। उनके पास काम की कमी है। सरकारी स्तर पर हेमंती देवी जैसे लोक कलाकारों को आगे बढ़ाने के लिए कदम उठाये जाने की दरकार है।