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रंगमंच पर कलाकारों ने बिखेरे घृणा, प्रेम और जिजीविषा के रंग
अमर उजाला ब्यूरो हल्द्वानी
Updated Tue, 20 Dec 2016 01:40 AM IST
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रंगमंच पर कलाकारों ने बिखेरे घृणा, प्रेम और जिजीविषा के रंग
- फोटो : अमर उजाला
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समाज द्वारा तिरस्कृत, बहिष्कृत और अछूत समझे जाने वाले लोगों के जीवन पर आधारित नाटक ‘दो दुखों का एक सुख’ ने जहां दर्शकों के अंत:करण को छूने का काम किया वहीं पात्रों की प्रस्तुति को खूब सराहा गया।
प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. शैलेश मटियानी लिखित नाटक ‘दो दुखों का एक सुख’ की प्रस्तुति यहां राजकीय मेडिकल कॉलेज में हुई।
अस्तित्व नाट्य कला विकास समिति के निर्देशक हरीश पांडे के निर्देशन में प्रस्तुत ‘दो दुखों का एक सुख’ सीढ़ियों पर बैठकर भीख मांगने वाले तीन इंसानों पर केंद्रित नाटक है। जिसमें एक कोढ़ी, एक अंधा और एक कानी महिला है।
आम इंसान की तरह इन भिखारियों के बदरंग जीवन में भी कई रंग हैं। जिनमें घृणा, ईर्ष्या, प्रेम और जिजीविषा देखने को मिलती है। नाटक में दिखाया गया है कि अल्मोड़ा में तीन मंखते (भिखारी) हैं।
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जो भीख मांगने के लिए एक ही स्थान पर तीन सीढ़ियों पर बैठते हैं। इनमें मृदुला नाम की एक कानी महिला है। कोढ़ी मृदुला को चाहने लगता है तो अंधा (सूरदास) भी मृदुला की गायन शैली से प्रभावित होकर उसे चाहने लगता है।
मृदुला साधो करम गति किन कारी गीत सुनाती है। सामने चाय की एक दुकान में कोढ़ी रोजाना चाय मांगता है। दुकानदार भिखारियों को दुकान से चाय आदि देता रहता है। मृदुला जो भी कमाती है, उसे एक जगत मिस्त्री रोज हड़पकर शराब में उड़ाता है।
एक बार भीख का पूरा पैसा मृदुला रामलीला कमेटी को चंदे में दे आती है तो जगत मिस्त्री उसे मारता है और उसकी इज्जत से भी खेलता है। कोढ़ी और अंधा मृदुला कानी को लेकर पहले एक दूसरे से ईर्ष्या और घृणा करते हैं।
करमिया कोढ़ी कहता है ‘अंधे, लूले काने, कोढ़ियों की कोई जात नहीं होती’। बाद में वह तीनों भी एक दूसरे के बगैर नहीं रह पाते हैं। समाज में अछूत समझे जाने वाले कोढ़ी करमिया की एक कोठरी में तीनों साथ रहते हैं।
अब तीनों इतने घनिष्ठ मित्र हैं कि वह एक दूसरे के बगैर रह नहीं पाते। करमिया कोढ़ी का डायलॉग ‘जिसका कोई नहीं, उसका परमात्मा होता’ दर्शकों को झकझोर कर रख देता है। अंतत: मृदुला गर्भवती हो जाती है।
वह एक सुंदर पुत्र को जन्म देती है। जिस पर करमिया कोढ़ी और अंधा सूरदास अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। पुत्र जन्म होने पर उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता है।
घृणा, ईर्ष्या, प्रेम, जिजीविषा के इस अनूठे संगम को नाटक में प्रभावी बनाने के लिए कुमाऊं के होली समेत अन्य पर्वों का मिश्रण किया गया। नाटक का संचालन डा. प्रदीप उपाध्याय ने किया। नाटक का उद्घाटन मुख्य अतिथि मंडी सभापति सुमित हृदयेश ने दीप जलाकर किया।
नाटक के पात्र
करमिया कोढ़ी की भूमिका घनश्याम भट्ट घनदा उर्फ कुमाऊं के नाना पाटेकर, सूरदास की भूमिका शंभू दत्त साहिल और मृदुला कानी का अभिनय नताशा परगांई ने किया। चाय दुकानदार: हरीश पांडे, जगत मिस्त्री: सुनील गौतम, दाई: रोशनी बोरा, आमा: प्रेमा जोशी। अन्य कलाकार: संगीता साह, नीरू बहुगुणा, कमला सिराड़ी, विमला पांडे, हिमांशु तिवारी, दीपांशु जोशी, राकेश शर्मा, मोहन जोशी, जगदीश उपाध्याय थे।
लीला मटियानी को किया सम्मानित
नाटक शुरू होने से पूर्व कार्यक्रम में आमंत्रित की गईं स्व. शैलेश मटियानी की पत्नी लीला मटियानी को सम्मानित किया गया। उन्हें लीला पांडे, ज्योति पांडे, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सीपी भैसोड़ा ने शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
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प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. शैलेश मटियानी लिखित नाटक ‘दो दुखों का एक सुख’ की प्रस्तुति यहां राजकीय मेडिकल कॉलेज में हुई।
अस्तित्व नाट्य कला विकास समिति के निर्देशक हरीश पांडे के निर्देशन में प्रस्तुत ‘दो दुखों का एक सुख’ सीढ़ियों पर बैठकर भीख मांगने वाले तीन इंसानों पर केंद्रित नाटक है। जिसमें एक कोढ़ी, एक अंधा और एक कानी महिला है।
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आम इंसान की तरह इन भिखारियों के बदरंग जीवन में भी कई रंग हैं। जिनमें घृणा, ईर्ष्या, प्रेम और जिजीविषा देखने को मिलती है। नाटक में दिखाया गया है कि अल्मोड़ा में तीन मंखते (भिखारी) हैं।
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जो भीख मांगने के लिए एक ही स्थान पर तीन सीढ़ियों पर बैठते हैं। इनमें मृदुला नाम की एक कानी महिला है। कोढ़ी मृदुला को चाहने लगता है तो अंधा (सूरदास) भी मृदुला की गायन शैली से प्रभावित होकर उसे चाहने लगता है।
मृदुला साधो करम गति किन कारी गीत सुनाती है। सामने चाय की एक दुकान में कोढ़ी रोजाना चाय मांगता है। दुकानदार भिखारियों को दुकान से चाय आदि देता रहता है। मृदुला जो भी कमाती है, उसे एक जगत मिस्त्री रोज हड़पकर शराब में उड़ाता है।
एक बार भीख का पूरा पैसा मृदुला रामलीला कमेटी को चंदे में दे आती है तो जगत मिस्त्री उसे मारता है और उसकी इज्जत से भी खेलता है। कोढ़ी और अंधा मृदुला कानी को लेकर पहले एक दूसरे से ईर्ष्या और घृणा करते हैं।
करमिया कोढ़ी कहता है ‘अंधे, लूले काने, कोढ़ियों की कोई जात नहीं होती’। बाद में वह तीनों भी एक दूसरे के बगैर नहीं रह पाते हैं। समाज में अछूत समझे जाने वाले कोढ़ी करमिया की एक कोठरी में तीनों साथ रहते हैं।
अब तीनों इतने घनिष्ठ मित्र हैं कि वह एक दूसरे के बगैर रह नहीं पाते। करमिया कोढ़ी का डायलॉग ‘जिसका कोई नहीं, उसका परमात्मा होता’ दर्शकों को झकझोर कर रख देता है। अंतत: मृदुला गर्भवती हो जाती है।
वह एक सुंदर पुत्र को जन्म देती है। जिस पर करमिया कोढ़ी और अंधा सूरदास अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। पुत्र जन्म होने पर उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता है।
घृणा, ईर्ष्या, प्रेम, जिजीविषा के इस अनूठे संगम को नाटक में प्रभावी बनाने के लिए कुमाऊं के होली समेत अन्य पर्वों का मिश्रण किया गया। नाटक का संचालन डा. प्रदीप उपाध्याय ने किया। नाटक का उद्घाटन मुख्य अतिथि मंडी सभापति सुमित हृदयेश ने दीप जलाकर किया।
नाटक के पात्र
करमिया कोढ़ी की भूमिका घनश्याम भट्ट घनदा उर्फ कुमाऊं के नाना पाटेकर, सूरदास की भूमिका शंभू दत्त साहिल और मृदुला कानी का अभिनय नताशा परगांई ने किया। चाय दुकानदार: हरीश पांडे, जगत मिस्त्री: सुनील गौतम, दाई: रोशनी बोरा, आमा: प्रेमा जोशी। अन्य कलाकार: संगीता साह, नीरू बहुगुणा, कमला सिराड़ी, विमला पांडे, हिमांशु तिवारी, दीपांशु जोशी, राकेश शर्मा, मोहन जोशी, जगदीश उपाध्याय थे।
लीला मटियानी को किया सम्मानित
नाटक शुरू होने से पूर्व कार्यक्रम में आमंत्रित की गईं स्व. शैलेश मटियानी की पत्नी लीला मटियानी को सम्मानित किया गया। उन्हें लीला पांडे, ज्योति पांडे, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सीपी भैसोड़ा ने शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।