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विरोध की चिंगारी से झुलसने लगा ‘हाथ’
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Tue, 13 Dec 2016 01:02 AM IST
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हल्द्वानी। जमीनों के मालिकाना हक का आंदोलन आगामी विधानसभा चुनाव में अहम मुद्दा बनेगा। बनभूलपुरा और दमुवाढूंगा के बाद गफूर और ढोलक बस्ती के पुनर्वास की मांग ने कांग्रेसियों की नींद उड़ाई है। कांग्रेस डैमेज कंट्रोल में जुटी है। लेकिन जनता के विरोध की चिंगारी से कांग्रेस झुलस रही है। चुनाव नजदीक आने के साथ चिंगारी भड़क रही है। भाजपाई इन आंदोलनों को हवा देकर हल्द्वानी सीट पर उलटफेर की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
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हल्द्वानी सीट से मुसलिम और दलित वोटर निर्णायक की भूमिका में हैं। कांग्रेस की इनके बीच पैठ रही है। 2017 के चुनाव में इनकी नाराजगी कांग्रेस पर भारी पड़ सकती है। दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक कांग्रेस की मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है। बनभूलपुरा की जनता मालिकाना हक की लड़ाई के लिए आंदोलित है। इस आंदोलन की कमान वित्तमंत्री डा. इंदिरा हृदयेश के कभी खासमखास रहे कांग्रेसियों के हाथों में है। वित्तमंत्री डा. हृदयेश का धुर विरोधी कांग्रेसी खेमा भी आंदोलन की आग में घी डाल रहा है। मुसलिम आंदोलन के बहाने कुछ कांग्रेसी खुद को स्थापित करने में जुटे हैं। आंदोलनकारियों ने ‘बनभूलपुरा संघर्ष समिति’ गठित की है। समिति पिछले दो महीने से सक्रिय है। समिति के निशाने पर कांग्रेस नहीं बल्कि डा. इंदिरा हृदयेश हैं। समिति से जुड़े लोग रात-दिन गली-मोहल्लों में जनसंपर्क और नुक्कड़ सभाएं कर डा. इंदिरा हृदयेश के वोट बैंक पर चोट कर रहे हैं।
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दमुवाढूंगा दलित बाहुल्य क्षेत्र है। दमुवाढूंगा में भी मालिकाना हक की लड़ाई सड़कों पर आ चुकी है। इस आंदोलन के पीछे भाजपा खड़ी है। हालांकि, आंदोलन का नेतृत्व दमुवाढूंगा संघर्ष समिति से जुड़े लोग कर रहे हैं। समिति में भाजपा, सपा, बसपा, आप से जुड़े नेता हैं। महापंचायत से शुरू आंदोलन अनिश्चितकालीन धरने में बदल गया है। दमुवाढूंगा वन भूमि पर काबिज है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है, जिससे जनता भी दुविधा में है। गफूर और ढोलक बस्ती के पुनर्वास आंदोलन की आग ने कैबिनेट मंत्री डा. हृदयेश की नींद उड़ाई है। दोनों ही मलिन बस्तियां रेलवे भूमि पर हैं। बस्तियों के पुनर्वास का मुद्दा राज्य और केंद्र के बीच फंसा है। वहीं, राजपुरा में भी आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है। इन सभी आंदोलनों में वित्तमंत्री डा. हृदयेश निशाने पर हैं। बकायदा, हर आंदोलन को सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता तक पहुंचाया जा रहा है।
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