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हाईकोर्ट ने खारिज की पीआईएल स्थानांतरित करने की मांग
ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल
Updated Sat, 23 May 2015 12:36 AM IST
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नैनीताल में सूखाताल के सौंदर्यीकरण संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रो. अजय रावत द्वारा उठाई गई आपत्तियों को आधारहीन बताते हुए दरकिनार कर दिया। न्यायमूर्ति आलोक सिंह एवं न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त खंडपीठ ने शुक्रवार को पीआईएल स्थानांतरित करने की मांग को ठुकरा दिया। कोर्ट ने इसे न्यायपालिका को दबाव में लेने का प्रयास बताया और भारी नाराजगी जताते हुए उन्हें अवमानना का दोषी माना तथा इसके लिए उन्हें चेतावनी भी दी।
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प्रो. रावत ने हाईकोर्ट में शपथपत्र दाखिल कर कहा कि उन्होंने जनहित याचिका में जो प्रकरण लिया था उस पर सुनवाई न होकर अन्य प्रकरणों को इसमें जोड़ दिया गया है। इस शपथपत्र पर बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान कोर्ट की ओर से पूछे जाने पर पालिका अधिवक्ता डीएस पाटनी, एलडीए के संदीप कोठारी, सरकारी अधिवक्ता सैय्यद नदीम ने कहा कि कोर्ट ने 30 अप्रैल व 7 मई को पंप खोले जाने के कोई मौखिक आदेश नहीं दिए थे। सुनवाई में यह बात जरूर आई थी कि तल्लीताल में डीजल नहीं मिलता।
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एलडीए द्वारा विवादित डीजल पंप की स्वीकृति नहीं दी गई थी अत: या तो केएमवीएन इसे ले ले या कहीं अन्यत्र पंप की संभावना तलाशी जाए, जिससे नागरिकों व पर्यटकों को राहत मिले। कोर्ट कमिश्नर सीडी बहुगुणा ने कहा कि कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे जिनसे याचिकाकर्ता व उनके अधिवक्ता से संबंधित लोगों के हित प्रभावित हो रहे हैं, इसीलिए वे पीआईएल स्थानांतरित कराने का प्रयास कर रहे हैं।
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याची की दलील
30 अप्रैल को कोर्ट ने मौखिक आदेश देकर तल्लीताल में विवादित व अवैध डीजल पंप खोलने को कहा, जिसकी स्वीकृति पूर्व में सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट से निरस्त हो चुकी हैं। प्रो. रावत ने याचिका की सुनवाई किसी अन्य बेंच को स्थानांतरित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि नैनीताल में ध्वस्तीकरण व अन्य प्रकरणों के संबंध में कोई मांग नहीं की थी और इनसे प्रार्थी की छवि खराब हो रही है।
उन्होंने तो केवल इको सेंसेटिव सूखाताल झील क्षेत्र में निर्माण व अन्य गतिविधियों को रोकने की मांग की थी। कहा कि हाईकोर्ट के निर्देश पर प्रशासन की कार्रवाई से नगर की जनता परेशान हो रही है।
क्या कहा कोर्ट ने
डीजल पंप मालिक के पक्ष में पंप खोले जाने के कोई मौखिक आदेश नहीं दिए तथा नैनीझील की सुरक्षा, सौंदर्यींकरण, शहर से कुत्तों व बंदरों को हटाने, नैनीझील की लाइफ लाइन नालों से अतिक्रमण हटाने, सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने संबंधी जो भी आदेश दिए उनसे कोर्ट का कोई व्यक्तिगत सरोकार नहीं था। याची अर्जी दायर करने के बाद पीआईएल को निर्देशित नहीं कर सकता।
कोर्ट इससे संबंधित प्रकरणों की सुनवाई के लिए भी स्वतंत्र है तथा इस पीआईएल में वह अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह कर रहा है। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से रोकने का प्रयास बताते हुए कड़ी नाराजगी जाहिर की तथा याचिकाकर्ता व अधिवक्ता के आरोपों को आधारहीन मानते हुए उन्हें कोर्ट की आपराधिक अवमानना का दोषी करार दिया, लेकिन कोर्ट ने इसके लिए उन पर कार्रवाई के बजाय चेतावनी देने का निर्णय लेते हुए कहा कि भविष्य में वे पुन: अवमानना जनक कार्य न करें।