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Nainital News: मानसून के बदल रहे व्यवहार का होगा अध्ययन
Thu, 27 Jun 2024 06:33 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Thu, 27 Jun 2024 06:33 AM IST
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नैनीताल। सितंबर के द्वितीय सप्ताह में कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधार्थी जॉर्जिया विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के संकाय सदस्य एवं शोधार्थियों के साथ जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के बदल रहे व्यवहार के बारे में अध्ययन करेंगे। इस सहयोगात्मक कार्य के निष्कर्ष का दोनों विवि संयुक्त प्रकाशन करेंगे। इसमें दोनों विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए वास्तविक योगदान के अनुसार सहयोगियों को उचित श्रेय दिया जाएगा।
जियोलॉजी विभाग के प्राध्यापक डॉ. राजीव उपाध्याय ने बताया कि भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून आमतौर पर जून और सितंबर के बीच होता है। जैसे ही सर्दियां खत्म होती हैं, दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर से गर्म, नम हवा भारत की ओर बहती है। हिमालय से टकराकर ग्रीष्मकालीन मानसून आर्द्र जलवायु और मूसलाधार वर्षा लाता है।
भारत और दक्षिण पूर्व एशिया ग्रीष्मकालीन मानसून पर निर्भर है। मानसून के अनिश्चित व्यवहार और उसकी अनियमितताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अतः जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून के उदासीन व्यवहार को देखते हुए इसकी गतिकी को समझने के लिए अधिक से अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।
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संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे पुराने सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में से एक जॉर्जिया विश्वविद्यालय के मध्य भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के व्यवहार के बारे में अध्ययन करने के लिए समझौता हुआ है। नेशनल साइंस फाउंडेशन यूएसए की ओर से प्रायोजित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत दोनों विवि संयुक्त रूप से भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के व्यवहार के बारे में अध्ययन करेंगे। उपकरणों की मदद से जो डाटा प्राप्त होगा और निष्कर्ष निकलेगा इसके अंतरराष्ट्रीय शोध समय-समय पर प्रकाशित होंगे।
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जियोलॉजी विभाग के प्राध्यापक डॉ. राजीव उपाध्याय ने बताया कि भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून आमतौर पर जून और सितंबर के बीच होता है। जैसे ही सर्दियां खत्म होती हैं, दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर से गर्म, नम हवा भारत की ओर बहती है। हिमालय से टकराकर ग्रीष्मकालीन मानसून आर्द्र जलवायु और मूसलाधार वर्षा लाता है।
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भारत और दक्षिण पूर्व एशिया ग्रीष्मकालीन मानसून पर निर्भर है। मानसून के अनिश्चित व्यवहार और उसकी अनियमितताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अतः जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून के उदासीन व्यवहार को देखते हुए इसकी गतिकी को समझने के लिए अधिक से अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।
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संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे पुराने सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में से एक जॉर्जिया विश्वविद्यालय के मध्य भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के व्यवहार के बारे में अध्ययन करने के लिए समझौता हुआ है। नेशनल साइंस फाउंडेशन यूएसए की ओर से प्रायोजित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत दोनों विवि संयुक्त रूप से भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के व्यवहार के बारे में अध्ययन करेंगे। उपकरणों की मदद से जो डाटा प्राप्त होगा और निष्कर्ष निकलेगा इसके अंतरराष्ट्रीय शोध समय-समय पर प्रकाशित होंगे।