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झाड़ियां रोक सकती दरकती पहाड़ियां
अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Thu, 28 Jul 2016 12:39 AM IST
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पहाड़ में भूस्खलन और पशुओं के चारा दोनों की समस्याओं से काफी हद तक झाड़ी छुटकारा दिला सकती है। पहाड़ियों में झाड़ियां लगाने का प्रस्ताव जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जायका) की तरफ से शासन को भेजा भी गया है।
पहाड़ में भूस्खलन आम बात हो चली है। भूस्खलन के बाद रास्ता खोलने, नये सिरे से सड़क बनाने आदि में हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। अब पहाड़ियों के दरकने से रोकने को झाड़ी का सहारा लेने पर विचार किया जा रहा है। जायका प्रोजेक्ट के सलाहकार एवं पूर्व मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान एसके सिंह कहते हैं टुसियारी, अग्निमंथा, कुर्री, रिठौल, मकोई, चित्रक जैसी झाड़ियों को वन विभाग ने चिह्नित किया है, जो भूस्खलन, भूक्षरण रोकने में कारगर हैं।
इन झाड़ियों की खूबी यह है कि यह बेहतर चारा और जलौनी प्रजाति हैं। ऐसे में ग्रामीणों को इनसे सीधे तौर पर लाभ होगा। यह वनाग्नि रोकने में भी मददगार हैं। इन प्रजातियों को कलम के माध्यम से बेहद आसानी से लगाया जा सकता है। इस संबंध में शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। अन्य प्रयोगों की तुलना में इसकी लागत भी कम होगी साथ में हरियाली बढ़ाने में भी मददगार होगी। उनके कार्यकाल में कुमाऊं में नैनीताल के सड़ियाताल, ज्योलीकोट और गढ़वाल में देववन (चकराता) शुरू भी किया गया था।
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पहाड़ में भूस्खलन आम बात हो चली है। भूस्खलन के बाद रास्ता खोलने, नये सिरे से सड़क बनाने आदि में हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। अब पहाड़ियों के दरकने से रोकने को झाड़ी का सहारा लेने पर विचार किया जा रहा है। जायका प्रोजेक्ट के सलाहकार एवं पूर्व मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान एसके सिंह कहते हैं टुसियारी, अग्निमंथा, कुर्री, रिठौल, मकोई, चित्रक जैसी झाड़ियों को वन विभाग ने चिह्नित किया है, जो भूस्खलन, भूक्षरण रोकने में कारगर हैं।
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इन झाड़ियों की खूबी यह है कि यह बेहतर चारा और जलौनी प्रजाति हैं। ऐसे में ग्रामीणों को इनसे सीधे तौर पर लाभ होगा। यह वनाग्नि रोकने में भी मददगार हैं। इन प्रजातियों को कलम के माध्यम से बेहद आसानी से लगाया जा सकता है। इस संबंध में शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। अन्य प्रयोगों की तुलना में इसकी लागत भी कम होगी साथ में हरियाली बढ़ाने में भी मददगार होगी। उनके कार्यकाल में कुमाऊं में नैनीताल के सड़ियाताल, ज्योलीकोट और गढ़वाल में देववन (चकराता) शुरू भी किया गया था।
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