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इलाज के अभाव में मर गई युवती
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 21 Jun 2017 11:32 PM IST
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डाक्टर
- फोटो : file photo
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अव्यवस्थाओं का अड्डा बन चुके सुशीला तिवारी अस्पताल में डॉक्टरों की संवेदनहीनता के चलते एक युवती की जान चली गई। युवती को पेशान न होने की समस्या थी और मंगलवार की रातभर उसको मेडिसिन और सर्जरी का मामला बताकर दौड़ाते रहे।
बिंदुखत्ता निवासी पिंकी (23 वर्षीय) को पेशाब नहीं हो रही थी। परिजन उसको लेकर मंगलवार की रात सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचे। परिजनों ने एसटीएच में कैज्यूअलटी का पर्चा कटवाया गया और डॉक्टरों को दिखाया। रात में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर ही पूरा अस्पताल चलाते हैं और वरिष्ठ डॉक्टर आना मुनासिब नहीं समझते हैं।
मंगलवार रात भी पिंकी के परिजनों को सर्जरी और मेडिसिन का मामला बताकर दौड़ाया गया। सूत्रों की मानें तो मरीज और परिजन रातभर डॉक्टरों से इलाज के लिए गुहार लगाते रहे मगर डॅाक्टरों का दिल नहीं पसीजा। डॉक्टर एक-दूसरे के सिर पर जिम्मेदारी डालकर बचने का प्रयास करते रहे।
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बुधवार सुबह जब ओपीडी शुरू हुई तो पिंकी के परिजन उसे वरिष्ठ डाक्टरों को दिखाने के लिए लाइन में लग गए। रात में तैनात रहे डॉक्टरों ने ये भी जहमत नहीं उठाई कि सुबह वरिष्ठ डॉक्टरों को जाकर उसकी समस्या बताते और बिना लाइन के गंभीर मरीज को दिखा देते।
लाइन में अपनी बार का इंतजार करते हुए पिंकी ने लगभग सवा आठ बजे ओपीडी के बाहर ही दम तोड़ दिया। परिजन अस्पताल से लगभग दो बजे पिंकी का शव लेकर गए।
पिंकी को पेशाब नहीं हो रही थी। डॉक्टरों ने ट्यूब डालकर पेशाब करा दी थी। जांच रिपोर्टों में पता चला कि लीवर के एनजाइमस बहुत बढ़े हुए थे। सीनियर रेजीडेंट डाक्टर भी बहुत नहीं समझ पाए। उन्होंने परिजनों से इलाज के लिए कहा तो परिजनों से सुबह ओपीडी में दिखाने को कहा था। ओपीडी के बाहर पिंकी की तबियत बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया।
डॉ. एके पांडे, एमएस, सुशीला तिवारी अस्पताल
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बिंदुखत्ता निवासी पिंकी (23 वर्षीय) को पेशाब नहीं हो रही थी। परिजन उसको लेकर मंगलवार की रात सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचे। परिजनों ने एसटीएच में कैज्यूअलटी का पर्चा कटवाया गया और डॉक्टरों को दिखाया। रात में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर ही पूरा अस्पताल चलाते हैं और वरिष्ठ डॉक्टर आना मुनासिब नहीं समझते हैं।
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मंगलवार रात भी पिंकी के परिजनों को सर्जरी और मेडिसिन का मामला बताकर दौड़ाया गया। सूत्रों की मानें तो मरीज और परिजन रातभर डॉक्टरों से इलाज के लिए गुहार लगाते रहे मगर डॅाक्टरों का दिल नहीं पसीजा। डॉक्टर एक-दूसरे के सिर पर जिम्मेदारी डालकर बचने का प्रयास करते रहे।
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बुधवार सुबह जब ओपीडी शुरू हुई तो पिंकी के परिजन उसे वरिष्ठ डाक्टरों को दिखाने के लिए लाइन में लग गए। रात में तैनात रहे डॉक्टरों ने ये भी जहमत नहीं उठाई कि सुबह वरिष्ठ डॉक्टरों को जाकर उसकी समस्या बताते और बिना लाइन के गंभीर मरीज को दिखा देते।
लाइन में अपनी बार का इंतजार करते हुए पिंकी ने लगभग सवा आठ बजे ओपीडी के बाहर ही दम तोड़ दिया। परिजन अस्पताल से लगभग दो बजे पिंकी का शव लेकर गए।
पिंकी को पेशाब नहीं हो रही थी। डॉक्टरों ने ट्यूब डालकर पेशाब करा दी थी। जांच रिपोर्टों में पता चला कि लीवर के एनजाइमस बहुत बढ़े हुए थे। सीनियर रेजीडेंट डाक्टर भी बहुत नहीं समझ पाए। उन्होंने परिजनों से इलाज के लिए कहा तो परिजनों से सुबह ओपीडी में दिखाने को कहा था। ओपीडी के बाहर पिंकी की तबियत बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया।
डॉ. एके पांडे, एमएस, सुशीला तिवारी अस्पताल