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भौतिकतावादी सोच प्रकृति के विदोहन का प्रमुख कारण
ब्यूरो /अमर उजाला, नैनीताल।
Updated Thu, 05 Nov 2015 12:47 AM IST
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एशिया पैसेफिक नेटवर्क फार ग्लोबल चेंज रिसर्च (एपीएन) कार्यक्रम के तहत आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी व डीएसबी परिसर के भूगोल विभाग की ओर से जलवायु परिवर्तन विषय पर ग्रामीणों, प्रशासन, विषय विशेषज्ञों व वैज्ञानिकों के बीच विभिन्न स्तरों की चर्चा व सुझावों के बाद इससे लड़ने के लिए आगामी दो वर्षों तक की कार्ययोजना तय कर प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे।
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इसी क्रम में बुधवार को होटल मनुमहारानी में इसकी शुरुआत की गई। जिसके तहत ग्रामीण, प्रशासनिक अधिकारी व विषय विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक पक्ष रखा तो ग्रामीणों ने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर अपना पक्ष रखा।
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यहां हुई चर्चा में यह पक्ष उभरकर सामने आया कि भौतिकता वादी सोच के चलते प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन हुआ है। जिसकी परिणति भी जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारण है। वक्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पहले भी हुए हैं, लेकिन पारंपरिक व अन्य तरीकों से इसे रोकने की पहल भी हुई।
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केदारनाथ त्रासदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज हम लोग जलवायु परिवर्तन से लड़ने की बजाए उसे सहने को तैयार है। विशेषज्ञों ने पूर्व में पृथ्वी के चार बार गर्म व चार बार ठंडी होने के बारे में बताया।
ग्रामीण काश्तकारों ने कहा कि आज हर घर तक पानी की होड़ ने पारंपरिक जल स्रोतों को खत्म कर दिया है। हैंडपंप का प्रयोग मुसीबत के समय होना चाहिए, लेकिन दूरगामी सोच के अभाव में लोग हैंडपंप के इस्तेमाल के साथ पानी की बरबादी करते हैं। अल्मोड़ा समेत कुमाऊं में लगातार सूखते जल स्रोत को भी उन्होंने प्रमुखता से रखा।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि चीड़ के बढ़ते जंगल व चौड़ी पत्ती व बांज के पेड़ कम होने ने जहां प्राकृतिक जल स्रोतों को कम किया है वहीं एक साथ पानी के बहाव भू-स्खलन का भी कारण बनता है।
भूगोल विभाग के प्रो. पीसी तिवारी के संचालन में हुई चर्चा में लांस हीथ, सुंदरम तिवारी, भगवती जोशी, नीमा सुयाल, शोभा दरम्वाल, पुष्पा नेगी, देवेंद्र सिंह बिष्ट, बसंत मेहता, डीसी पंत, पूरन सिंह बिष्ट, सुरेंद्र नेगी, मोहन सिंह आदि थे। प्रो. तिवारी ने बताया कि संस्था रामगढ़ तथा इससे लगे क्षेत्र में आगामी दो वर्षों तक कार्य करेगी।