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लाइफ लाइन से ही उखड़ रहीं पहाड़ की सांसें
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Tue, 05 Jul 2016 12:35 AM IST
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पहाड़ की लाइफ लाइन मानी जाने वाली सड़कें विनाश को भी न्यौता देने वाली साबित हो रही हैं। एक सर्वे के मुताबिक 2008 के बाद चार धाम यात्रा मार्ग के चौड़ीकरण से 190 से भी अधिक भूस्खलन क्षेत्र विकसित हो गए थे। दिक्कत सड़क बनाने में नहीं, बनाने के तरीके की है। विशेषज्ञों की राय के खिलाफ सड़क बनाने में धड़ल्ले से डायनामाइट का उपयोग होता है और पहाड़ कमजोर होते जाते हैं। सड़क काट कर मलबा नीचे ढलान में डाल दिया जाता है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। बरसात में हाल और खराब हो जाता है।
हर घर तक सड़क पहुंचाने की राजनीतिक मजबूरी के चलते सरकारें सड़कों का जाल बिछाए जाने की कोशिश करती हैं। यह स्वीकार किया जा रहा है कि जिन इलाकों में नई सड़कें बनाई जा रही हैं, वहां भूस्खलन की घटनाएं भी ज्यादा हो रही हैं।
सड़क निर्माण में आसान तरीके के रूप में डायनामाइट का सबसे अधिक उपयोग होता रहा है। 2013 की आपदा के बाद राज्य आपदा न्यूनीकरण केंद्र की ओर से हुए एक सर्वे के मुताबिक 2008 के बाद चार धाम यात्रा मार्ग के चौड़ीकरण के कारण ही करीब 190 से अधिक भूस्खलन क्षेत्र विकसित हो गए थे। विशेषज्ञों का साफ मानना है कि सड़कों के निर्माण में डायनामाइट का उपयोग पहाड़ों को कमजोर कर रहा है। लोक निर्माण विभाग का कहना है कि सड़काें का उपयोग करना मजबूरी है, लेकिन एहतियात बरतते हुए बारूद का नियंत्रित उपयोग किया जाता है। लोक निर्माण का तर्क कुछ हद तक सही है। मुसीबत यह है कि सड़क की कटिंग का काम ठेकेदारों को आउटसोर्स पर दिया जाता है और ठेके दारों के लिये सबसे आसान तरीका बारूद का उपयोग करना ही होता है।
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फिक्की ने भी उठाया मसला
हल्द्वानी। जिनेवा में स्थित फिक्की की इंटरनेशनल रोड फेडरेशन ने भी इस सवाल को उठाया है। फिक्की की ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर कमेटी के को-चेयरमैन केके कपिला की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि उत्तराखंड में पहाड़ को कम नुकसान पहुंचाने वाली सड़क निर्माण की तकनीक का उपयोग होना चाहिए। पहाड़ में सड़क बनाने का सबसे बेहतर तरीका है कि सुरंगों का उपयोग किया जाए। इसका बेहतर उदाहरण है कालका-शिमला रेल मार्ग।
देवीधुरा सड़क से लिया होता सबक
हल्द्वानी। देवीधुरा सड़क निर्माण में डायनामाइट का उपयोग बिल्कुल नहीं किया गया। ऐसे में इस सड़क पर न के बराबर भूस्खलन क्षेत्र हैं। अधिकारियों के मुताबिक इस मार्ग का निमार्ण मैनुअल तरीके से ही किया गया। मलबा निस्तारण के लिए भी प्रबंध किया गया।
अनपाने पड़े नियंत्रण के तरीके
सड़कों के निर्माण के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में वन भूमि हस्तांतरण की बात होती है। इसमें भी यह शर्त है कि सड़क निर्माण में बारूद का उपयोग न किया जाए। नैनीताल-काठगोदाम सड़क मार्ग पर भुजियाघाट के निकट डायनामाइट का उपयोग करके सड़क बनाई गई थी। इससे भूस्खलन हो रहा था। यहां पर वन विभाग को नियंत्रण के तरीके अपनाने पड़े।
-डा. पराग मधुकर धधाते, प्रभारी वन अधिकारी, तराई पूर्वी
कम से कम हो रहा है डायनामाइट का उपयोग
डायनामाइट का उपयोग कम से कम करने के लिए जेसीबी और पोकलैंड मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। अल्मोड़ा डिवीजन में हाल्फ फिल, हाल्फ फैड तरीका अपनाया जा रहा है। इससे मलबे का उपयोग ही सड़क बनाने में किया जा रहा है। इसी तरह ड्रेनेज पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
- अयाज अहमद, मुख्य अभियंता, राष्ट्रीय राजमार्ग।
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हर घर तक सड़क पहुंचाने की राजनीतिक मजबूरी के चलते सरकारें सड़कों का जाल बिछाए जाने की कोशिश करती हैं। यह स्वीकार किया जा रहा है कि जिन इलाकों में नई सड़कें बनाई जा रही हैं, वहां भूस्खलन की घटनाएं भी ज्यादा हो रही हैं।
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सड़क निर्माण में आसान तरीके के रूप में डायनामाइट का सबसे अधिक उपयोग होता रहा है। 2013 की आपदा के बाद राज्य आपदा न्यूनीकरण केंद्र की ओर से हुए एक सर्वे के मुताबिक 2008 के बाद चार धाम यात्रा मार्ग के चौड़ीकरण के कारण ही करीब 190 से अधिक भूस्खलन क्षेत्र विकसित हो गए थे। विशेषज्ञों का साफ मानना है कि सड़कों के निर्माण में डायनामाइट का उपयोग पहाड़ों को कमजोर कर रहा है। लोक निर्माण विभाग का कहना है कि सड़काें का उपयोग करना मजबूरी है, लेकिन एहतियात बरतते हुए बारूद का नियंत्रित उपयोग किया जाता है। लोक निर्माण का तर्क कुछ हद तक सही है। मुसीबत यह है कि सड़क की कटिंग का काम ठेकेदारों को आउटसोर्स पर दिया जाता है और ठेके दारों के लिये सबसे आसान तरीका बारूद का उपयोग करना ही होता है।
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फिक्की ने भी उठाया मसला
हल्द्वानी। जिनेवा में स्थित फिक्की की इंटरनेशनल रोड फेडरेशन ने भी इस सवाल को उठाया है। फिक्की की ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर कमेटी के को-चेयरमैन केके कपिला की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि उत्तराखंड में पहाड़ को कम नुकसान पहुंचाने वाली सड़क निर्माण की तकनीक का उपयोग होना चाहिए। पहाड़ में सड़क बनाने का सबसे बेहतर तरीका है कि सुरंगों का उपयोग किया जाए। इसका बेहतर उदाहरण है कालका-शिमला रेल मार्ग।
देवीधुरा सड़क से लिया होता सबक
हल्द्वानी। देवीधुरा सड़क निर्माण में डायनामाइट का उपयोग बिल्कुल नहीं किया गया। ऐसे में इस सड़क पर न के बराबर भूस्खलन क्षेत्र हैं। अधिकारियों के मुताबिक इस मार्ग का निमार्ण मैनुअल तरीके से ही किया गया। मलबा निस्तारण के लिए भी प्रबंध किया गया।
अनपाने पड़े नियंत्रण के तरीके
सड़कों के निर्माण के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में वन भूमि हस्तांतरण की बात होती है। इसमें भी यह शर्त है कि सड़क निर्माण में बारूद का उपयोग न किया जाए। नैनीताल-काठगोदाम सड़क मार्ग पर भुजियाघाट के निकट डायनामाइट का उपयोग करके सड़क बनाई गई थी। इससे भूस्खलन हो रहा था। यहां पर वन विभाग को नियंत्रण के तरीके अपनाने पड़े।
-डा. पराग मधुकर धधाते, प्रभारी वन अधिकारी, तराई पूर्वी
कम से कम हो रहा है डायनामाइट का उपयोग
डायनामाइट का उपयोग कम से कम करने के लिए जेसीबी और पोकलैंड मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। अल्मोड़ा डिवीजन में हाल्फ फिल, हाल्फ फैड तरीका अपनाया जा रहा है। इससे मलबे का उपयोग ही सड़क बनाने में किया जा रहा है। इसी तरह ड्रेनेज पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
- अयाज अहमद, मुख्य अभियंता, राष्ट्रीय राजमार्ग।