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Kargil: नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया, 25 साल पहले खड़ी चढ़ाई पर बैठे दुश्मन को मारा; जानें क्या बोले वीर जवान?
Fri, 26 Jul 2024 10:56 AM IST
हीरा मेहरा
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
Published by: हीरा मेहरा
Updated Fri, 26 Jul 2024 10:56 AM IST
सार
कारगिल विजय दिवस की 25वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर अमर उजाला कार्यालय पहुंचे पूर्व सैनिकों और अधिकारियों ने युद्ध के संस्मरण साझा किए। वीर जवानों ने बताया कि सबसे खतरनाक युद्ध के मैदान में जीत हासिल करना स्वर्णिम पल था।
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वीर जवान
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कारगिल विजय दिवस की 25वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर अमर उजाला कार्यालय पहुंचे पूर्व सैनिकों और अधिकारियों ने युद्ध के संस्मरण साझा किए। वीर जवानों ने बताया कि सबसे खतरनाक युद्ध के मैदान में जीत हासिल करना स्वर्णिम पल था। नामुमकिन लगने वाली जीत को भारतीय सेना ने मुमकिन कर दिखाया।
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मुश्किल युद्ध क्षेत्र इसलिए क्योंकि दुश्मन पहाड़ी पर बैठा था और उसे हमारी हर गतिविधि की नजर थी। थोड़ी सी भी असावधानी की गुंजाइश नहीं थी। हैवी सेलिंग के बीच भारतीय सेना ने अपने 527 जवानों की शहादत के बाद कारगिल की मुश्किल पहाड़ियों पर तिरंगा लहराया था। इस जीत से भारतीय सेना ने दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया था।
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सेवानिवृत्त मेजर वीएस रौतेला ने बताया कि दुश्मन सेना ने वहां पक्के बंकर बना लिए थे और वहां खाने-पीने का पूरा इंतजाम करके बैठे थे। इस युद्ध की सबसे बड़ी चुनौती सामने से लड़ने की थी, दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था। इस युद्ध में भारतीय सेना के 1323 जवान घायल हुए थे। कारगिल युद्ध में शामिल रहे कैप्टन सुरेश चंद्र भट्ट ने बताया कि पाकिस्तानी सेना जब भागने लगी तो जाते समय माइंस बिछा गई, जिसकी वजह से हमारे घायलों की संख्या बढ़ गई। ढाई माह तक चले युद्ध में अपने कई साथियों को अपने सामने शहीद होते हुए देखा। बर्फ पिघालकर पीते थे लेकिन यह पानी भी हैवी सेलिंग की वजह से कडुआ हो गया था। भट्ट ने बताया कि जब हम पाकिस्तानियों के बंकर में पहुंचे तो वहां काफी राशन पानी मौजूद था। हम तो राशन ऊपर ले नहीं गए थे लिहाजा हमने उनका ही राशन खाया।
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कारगिल युद्ध में बलिदान होने वाले सैनिकों की बहादुरी के अनगिनत किस्से हैं। युद्ध के दौरान घर से चिट्ठी आती थी तो जवान बेस से पत्र की जानकारी देने वाले को ही कह देते थे कि पढ़कर जवाब दे देना शहर की कई समस्याओं का भी जिक्र आया। पूर्व सैनिकों ने कहा कि शहर में ऐसा बड़ा पार्क नहीं है जहां वरिष्ठ नागरिक और बुजुर्ग योग कर सकें और एक साथ घूम फिर सकें। गृहकर से छूट और सरकारी नौकरियों में पूर्व सैनिकों को 50% तक आरक्षण देने की मांग भी उठाई। वीर सैनिकों ने अमर उजाला में अखवार का प्रकाशन भी देखा। अग्निवीर के बारे में कहा कि इसका दुष्प्रचार ज्यादा हुआ है। युवा जब लौटकर चार साल की सर्विस से लौटकर आएगा तो उसके लिए अर्द्धसैनिक बल और निजी क्षेत्रों में नौकरी के द्वार खुले होंगे। हालांकि अग्निवीरों के लिए नौकरी में आरक्षण और बढ़ाना चाहिए ताकि अपने बेटे भविष्य के प्रति चिंतित परिजनों को सुकून मिले। कैप्टन खुशाल सिंह रावत ने कहा कि रोडवेज की बसों में सभी वीर नारियों को मुफ्त सेवा की सुविधा मिलनी चाहिए। वर्तमान में चक्र श्रेणी के अवार्ड की वीर नारियों को ही यह सुविधा मिली हुई है। गृहकर में छूट मिलनी चाहिए।
वर्तमान में सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को इस दायरे से बाहर कर दिया गया है। रकम बड़ी नहीं है लेकिन यह सम्मान से जुड़ी बात होती है। कोरोना के दौरान ट्रेनों में सीनियर सिटिजन को दी गई छूट समाप्त की गई थी जो कोरोना खत्म होने के बाद भी शुरू नहीं की गई है। हवलदार प्रकाश मिश्रा (रि.) ने बताया कि लालकुंआ बाजार से गौला की तरफ जाने के लिए ओवरब्रिज बनाया जाए। कुछ स्थानीय दुकानदारों और राजनीतिक दलों के कारण सर्वे होने के बाद भी कार्य रोका गया है। ट्रेन की आवाजाही के चलते पूरे दिन लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है। भीम सिंह राणा ने बताया कि गुलाबघाटी से दानीजाला की तरफ झूलापुल प्रस्तावित है लेकिन सालों बाद भी यह फाइलों से बाहर नहीं निकाला। गौला का जलस्तर बढ़ने पर दूसरी ओर से काठगोदाम आने के लिए लोगों को रानीबाग होते हुए घूमकर आना पड़ता है। 150 के करीब परिवार परेशान हैं। पूर्व सैनिकों ने एक सुर में कहा कि हल्द्वानी में तिकोनिया के पास बने अर्मी एरिया के लिए वन भूमि सेना को हस्तांतरित करने देनी चाहिए। यहां नए निर्माण की बाध्यता के चलते केंद्रीय विद्यालय भी दो पालियों में चलाना पड़ रहा है। कक्षाएं टीम शेड में चल रही हैं।
लेटलतीफी पर आता है गुस्सा
अनुशासान के लिए जाने वाली सेना से सेवानिवृत्त हुए पूर्व सैनिकों का कहना है कि विभागों में जो आज नहीं कल आने वाली परिपाटी है वह बंद होनी चाहिए। हम अनुशासित रहे हैं लिहाजा हमारा काम भी समय पर होना चाहिए, जो तरीख दी गई उसी तारीख पर काम होना चाहिए।
कुमाऊं रेजिमेंट में मूल निवासी हों
पूर्व सैनिकों ने कहा कि कुमाऊं रेजिमेंट का वार क्राइ जय काली माता है। हमारी भावनाएं कुमाऊं रेजिमेंट से जुड़ी हैं और यह काफी गहरी हैं। हमारा मानना है कि अलग-अलग रेजिमेंट में वहीं के मूल निवासियों को रखना चाहिए ताकि अपनी कौम और अपनी रेजिमेंट के लिए जोश बना रहे।
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