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एक कलमकार के अंदर था, एक आंदोलनकारी
विजेंद्र श्रीवास्तव/अमर उजाला,हल्द्वानी
Updated Wed, 29 Apr 2015 01:15 AM IST
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शब्द केवल कागज पर लिखी चंद लाइनें नहीं होते, बल्कि वह ताकत होती है, जो हुकूमतों को सोचने पर विवश करती है। इन्हीं शब्दों के जरिए जनता के दर्द, उनके हक के लिए अमर उजाला हल्द्वानी के संपादक दिवंगत सुनील शाह ने आवाज बुलंद की। कलम के जरिए वह हमेशा आंदोलनों के अगुवा रहे।
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बात हमारे पहाड़ को खोखला कर आपदा की बुनियाद तैयार करने वालों के विरुद्ध हो या फिर उस सरकारी तंत्र के खिलाफ जो जनता के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य के नाम पर खिलवाड़ करने पर उतारू है। वह उन नेताओं के खिलाफ मुखर रहे जो केवल वादे करते हैं। अगर वह साथ थे तो हमेशा उस व्यक्ति के जो बेआवाज, सिस्टम से पिसा हुआ था। जल, जंगल, जमीन हमेशा उनके केंद्र में रहे।
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उनका जन्म नैनीताल में हुआ तो उस मिट्टी की खुशबू और उसके लिए दर्द हमेशा सुनील शाह जी के लिए रहा। बरेली से जब अखबार छपता था और उत्तराखंड आंदोलन को लेकर संघर्ष शुरू हुआ तो उन्होंने कलम के जरिए आंदोलन को धार दी। आज भी लोग अमर उजाला के उस योगदान को भूले नहीं। 2011 में जब उन्होंने हल्द्वानी में अमर उजाला के संपादक की जिम्मेदारी संभाली तो फिर जन आंदोलन शुरू किया, उनमें हमेशा इस बात की कसक थी कि जिस उम्मीद, सपनों के साथ राज्य बना, वह पूरा नहीं हुआ। एक ऐसे लोगों की जमात जरूर तैयार हो गई, जो हमारी मिट्टी, जंगल और हमारे सपनों को खत्म कर रही है।
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रामनगर में ज्वाला वन हो या फिर कार्बेट पार्क में अवैध योजना और उसके अंदर के चकों की जमीन की लूट हो रही थी, वह कौन हैं जो इस लूट में शामिल हैं, उनके राजदार और मददगार के खिलाफ अभियान छेड़ा। इससे जंगल को बचाने में मदद मिली। बेड़ीनाग से लेकर नैनीताल तक राजस्व जमीन की लूट से लेकर पहाड़ को खोखला करने वालों को बेनकाब करने के अभियान में जुटे। वह कहते थे कि एक अखबार वाला अगर सामान्य तौर पर एक कब्जा, लूट देख सकता है तो मोटी तनख्वाह पाले अफसरों को क्यों नहीं दिखता है? ऐसे में धृतराष्ट्र अफसरों के आंख खोलने की कोशिश की।
लोकसभा चुनाव का समय आया तो दुर्गम लाइव शुरू किया, इसमें रिपोर्टर हंसपुर खत्ता जैसी जगहों पर पहुंचे, जहां कभी माओवादियों का ट्रेनिंग कैंप था। पहाड़ में तिब्बत सीमा के करीब नाचनी तक चुनाव केंद्र रहा। उन्होंने बताया कि कैसे चुनाव के वक्त पूरा तंत्र वोट के लिए हर सुविधा संसाधन जुटा देता है, लेकिन बाद में वही इलाके सरकार की आंख से ओझल हो जाते हैं।
उनकी हमेशा से अपने इतिहास, संस्कृति को लेकर अभिमान, लगाव और उसे बचाने की ललक थी। करीब सवा सौ साल पुराने हल्द्वानी के ब्रिटिशकालीन तहसील भवन को गिराने की बात हुई तो उन्होंने ऐतिहासिक इमारत को बचाने के लिए खबरों के जरिए आंदोलन छेड़ दिया। नतीजतन लोग सामने आए और बाद में हुकूमत को अपना फैसला बदलना पड़ा। नई पीढ़ी अपने अतीत को जाने, इसके लिए कुमाऊं डिस्कवर जैसे कालम को शुरू किया। इसमें अतीत से जुड़ी तमाम बातों को सामने लाया गया, जिसे लोग बिसारने लगे थे।
अगर बात उनके लगाव की की जाए तो वह चिड़ियों के लिए भी बहुत फिक्रमंद थे। वह मेरठ से यहां आए थे तो बोले मैंने वहां पर ‘चिड़ियों के चहचहाने की चिंता करो’ कालम शुरू किया था। हमारे यहां तो चिड़ियों की न जाने कितनी प्रजातियां हैं, यह कालम शुरू होगा। इसका असर हुआ कि यह एक स्व: स्फूर्त आंदोलन बन गया। वन महकमे ने चिड़ियों को बचाने के लिए कृत्रिम घोंसले बांटने शुरू किए, तो लोगों ने भी चिड़ियों के लिए घोंसले बनाने के साथ पानी, दाने की व्यवस्था की।
अतिक्रमण हो, शिक्षा का बाजारीकरण हो या फिर हमारे गंदगी से पटे हुए शहर। हर बार वह मुखर रहे। इस बात से बेफिक्र की ताकतवर लोग क्या सोचते हैं, बल्कि इस बात को लेकर चिंतित कि आवाम क्या सोचती है। उन्होंने पानी के जलाशय जो कि हमारी जमीन पर है, उनका अधिकार क्यों यूपी के पास हो, इसे लेकर भी अभियान चलाया। ऐसे न जाने कितने सिलसिले, किस्से हैं, जो उनसे जुड़े हैं। वह हर दिन खबर के जरिए एक आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करते थे, एक कलमकार के अंदर आंदोलनकारी था। जो हर दिन जनता के हक में आवाज बुलंद करता था।