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दिल की बात हिंदी में करता हूं : जस्टिस चंद्रचूड़

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sun, 08 Mar 2020 02:03 AM IST
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I talk about my heart in Hindi: Justice Chandrachud
नैनीताल के डीएसबी परिसर में 16वें दीक्षांत समारोह में मेडिल मिलने पर खुशी मनाते छात्राएं। - फोटो : NAINITAL
नैनीताल। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और निर्णयों में भले ही अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व रहता हो लेकिन कोर्ट के न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने कुमाऊं विश्वविद्यालय के16वें दीक्षांत समारोह में अपना व्याख्यान हिंदी में दिया और यह कह कर सबका दिल जीत लिया कि जब दिल की बात करनी हो तो हिंदी में करता हूं। समारोह में माता-पिता के सम्मान और सेवा की सीख छाई रही।
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जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उनके परिजन महाराष्ट्र में हैं। उनसे मराठी में बात होती है, कोर्ट में तमाम मसलों में विचार की प्रक्रिया अंग्रेजी में होती है लेकिन जब दिल की बात करनी हो तो हिंदी में ही करता हूं। उन्होंने माता-पिता की सेवा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि बचपन में माता-पिता रा- रात जागकर और हर परेशानी से बच्चों को बचाते हैं उसी वजह से बच्चे सुरक्षित रह कर किसी मुकाम तक पहुंच पाते हैं। अत: उन्हें भी माता-पिता की सेवा के प्रति उतना ही सजग रहना चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारे देश में जाति, धर्म, सम्प्रदाय, परिवेश के कारण जीवन शैली अलग अलग हो सकती है लेकिन एक दूसरे की शैली का सम्मान करना देश की एकता के लिए महत्वपूर्ण है।
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गंगाराम अस्पताल के लिवर ट्रांसप्लांट विभागाध्यक्ष डा. सौमित्र रावत ने कहा कि वे 18 वर्षों से इंग्लैंड में सेवारत थे उन्हें वहां उच्च स्तर का मुकाम मिल चुका था जो उससे पहले किसी अन्य भारतीय डॉक्टर को नहीं मिला था और आगे भी असीम संभावनाएं थीं उन्होंने इंग्लैंड में ही बसने का निर्णय ले लिया था। एक दिन उनकी मां का भारत से फोन आया कि पिताजी का स्वास्थ्य बहुत खराब है, बचना मुश्किल है। इस बात से उन्हें बचपन से अब तक की तमाम स्मृतियां याद आ गईं वे तत्काल भारत लौटे और माता-पिता की सेवा के लिए इंग्लैंड बसने का इरादा त्याग दिया और यहीं गंगाराम अस्पताल में काम शुरू कर दिया।
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राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने कहा कि उनके माता-पिता का भी सपना उन्हें किसी मुकाम पर देखने का था और उनकी प्रबल इच्छा के कारण ही उन्हें जीवन में सफलता मिल सकी। शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने भी डिग्री प्रदान किए जाने के दौरान दिए गए पारंपरिक दीक्षोपदेश में वर्णित वाक्य ‘माता पिता को देवता समझो’का उल्लेख करते हुए कहा कि बगैर माता-पिता के आशीर्वाद के व्यक्ति को जीवन में कभी सफलता नहीं मिल सकती और उनके सम्मान से हर बाधा दूर हो जाती है।
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