{"_id":"57c5ce4c4f1c1b0b4b2cc167","slug":"how-people-are-living-in-the-state-will-now-face","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब आएगा सामने कि प्रदेश के लोग जी कैसे रहे हैं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब आएगा सामने कि प्रदेश के लोग जी कैसे रहे हैं
सुधाकर भट्ट
Updated Tue, 30 Aug 2016 11:49 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राज्य गठन के 15 साल बाद ही सही अब यह भी सामने आएगा कि प्रदेश में लोग किस तरह का जीवन जी रहे हैं। अब प्रदेश में पिछड़ेपन, पहाड़ की दुर्दशा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आय आदि को सामने रखने और परखने की तैयारी है।
विज्ञापन
इसके लिए मानव विकास रिपोर्ट तैयार की जा रही है। अर्थ एवं संख्या निदेशालय इस रिपोर्ट को किसी अन्य एजेंसी के जरिए अधिकतम डेढ़ साल में तैयार करेगा।
निदेशालय इस काम के लिए कृषि, सामाजिक आदि क्षेत्रों में काम करने और मानव विकास रिपोर्ट तैयार करने में दक्ष संस्थाओं की मदद लेगा। निदेशक मनोज पंत के मुताबिक रिपोर्ट एक साल में तैयार होगी।
विज्ञापन
निदेशालय की ओर से आय एवं मानव विकास के सूचकांक तैयार कर लिए गए हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने पर यह भी साफ हो सकेगा कि प्रदेश में पिछड़ेपन का कारण क्या है और जिला स्तर पर विषमता किस हद तक मौजूद है।
विज्ञापन
खास बात यह भी है कि रिपोर्ट मे जल विद्युत परियोजनाओं, वन संसाधन, बागवानी, खेती आदि की सफलता, असफलता की केस स्टडीज भी होंगी और इसके आधार पर भविष्य का ब्ल्यू प्रिंट भी सामने रखा जाएगा।
पलायन की पड़ताल के साथ ही खेती, बागवानी आदि में पिछड़ेपन को भी इस रिपोर्ट में आधार बनाया जा रहा है। हाल ही अर्थ एवं संख्या निदेशालय ने प्रदेश के आर्थिक विकास से संबंधित आंक ड़ें जारी किये थे तो प्रदेश सरकार को अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिल गया था।
आठ से अधिक की विकास दर पर तुरंत ही प्रदेश को तेजी से विकसित होता राज्य घोषित कर दिया गया था। अर्थ एवं संख्या निर्देशालय ने इसके बाद प्रदेश के सामाजिक और आर्थिक बिंदुओं पर रिपोर्ट जारी की थी तो यह भी साफ उभर कर सामने आया था कि प्रदेश में सामाजिक और आर्थिक स्तर पर बड़ी खाई मौजूद है।
इन बिंदुओ पर तैयार होगी रिपोर्ट
1 - राज्य एवं जिला स्तर पर आजीविका, रोजगार, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, विषमता, खेती और प्रदेश के पिछड़ेपन के कारक
2 - जेंडर एवं सामाजिक विषमता
3 - विशेष समूहों के लिये चलाई जा रही सरकारी, गैर सरकारी योजनाओं की उपयोगिता
4 - शहरीकरण से संबंधित मामले, इसी में पलायन और मानव विकास पर भी अलग से रिपोर्ट
5 - रिपोर्ट में यह भी सामने रखा जाएगा कि किस तरह से प्रदेश केपिछड़ेपन से निपटा जा सकता है।
6 - रिपोर्ट में यह तथ्य भी उभर कर सामने आएगा कि प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास में हाशिए पर पड़े समूह किस तरह से शामिल हो पा रहे हैं।
7 - विकास को लेकर प्रदेश के लोगों की आकांक्षाओं का ब्ल्यू प्रिंट भी तैयार किया जाएगा।
8 - मानव विकास और जीवन शैली से संबंधित सूचकांक जिला स्तर पर भी तैयार किये जाएंगे।
हिमाचल के लिए 2002 में हो गई थी रिपोर्ट तैयार
हैरानी की बात यह है कि हिमाचल के लिये 2002 में ही केंद्रीय योजना आयोग ने मानव विकास रिपोर्ट तैयार कर ली थी, पर नवोदित राज्य उत्तराखंड के लिए योजना आयोग यह रिपोर्ट 2013 तक तैयार नहीं कर पाया।
हद यह रही कि स्टेट डेवलपमेंट रिपेार्ट ही प्रदेश के लिये 2009 में तैयार हो पाई। 2013 में ही केदारनाथ की आपदा के बाद प्रदेश में सकल पर्यावरणीय उत्पाद तैयार करने की बात हुई थी, पर राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी से इस मुहिम ने दम तोड़ दिया।
पूर्व मुख्य साचिव और मुख्यमंत्री के सलाहकार इंदु कुमार पांडे के मुताबिक राज्य में सटीक आंकड़ों की कमी की वजह से शायद योजना आयोग यह काम नहीं कर पाया।