फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Nainital News ›   High risk of parasitic infection in valley and riverine area of ??the state

राज्य के घाटी और नदी वाले क्षेत्र में परजीवी संक्रमण का खतरा अधिक

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 20 Oct 2020 02:03 AM IST
विज्ञापन
High risk of parasitic infection in valley and riverine area of ??the state
प्रतीकात्मक फोटो।
हल्द्वानी। उत्तराखंड में घाटियों और नदी वाले क्षेत्र में बकरियों में परजीवी संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। आईवीआरआई मुक्तेश्वर के वैज्ञानिक ने बकरियों में होने वाले परजीवी संक्रमण को लेकर पांच वर्षों तक मौसमी आधार पर अध्ययन किया। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को छोड़कर प्रदेश के 11 जिलों में अध्ययन के बाद यह नतीजा सामने आया।
विज्ञापन

परजीवी पर आईवीआरआई मुक्तेश्वर के वैज्ञानिक डॉ. मुथु शंकर ने पांच वर्षों तक अध्ययन किया। अभी वह आईवीआरआई बरेली में कार्यरत हैं। उन्होंने हर मौसम में बकरियों के मल की पांच साल तक जांच की। इससे पता लगा कि प्रदेश के पर्वतीय जिलों में हीमोंकस कंटोर्ट्स और टेलाडोरसेजिया सर्कमर्सिन्क्टा मुख्य नेमोटोड परजीवी पाए गए।
विज्ञापन

हीमोंकस कंटोर्ट्स अधिक सर्दी वाले मौसम को छोड़कर पूरे वर्ष रहता है, जबकि टेलाडोरसेजिया सर्कमर्सिन्क्टा पूरे वर्ष मिलता है। इसके अतिरिक्त कुछ दूसरे तरह के परजीवी भी मिले हैं। संक्रमण की अधिकता मानसून और मानसून के बाद के मौसम में सबसे अधिक देखी गई। राज्य के अधिकतर हिस्सों में संक्रमण की तीव्रता कम से मध्यम तक होती है मगर घाटी और नदी वाले क्षेत्रों में संक्रमण की दर अधिक है।
विज्ञापन
विज्ञापन

परजीवी संक्रमण पशुओं के प्रजनन और स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या है। इससे पशुपालकों को आर्थिक हानि होने की संभावना रहती है। संक्रमित पशु के मल के संपर्क में आने वाले चारे और घास के माध्यम से स्वस्थ पशुओं में संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। परजीवी पशुओं के शरीर के अंदर पहुंचकर अपना पोषण पशु के शरीर से प्राप्त करते हैं और पशु को रोगग्रस्त करके कमजोर बना देते हैं।
परजीवी पर क्लोजेंटेल और आइवरमेक्टिन है कारगर
हल्द्वानी। राज्य में जठरांत्र नेमाटोड परजीवियों में कृमिनाशक प्रतिरोध की स्थिति का अध्ययन करने पर पता चला कि पर्वतीय जिलों में बेंजिमिडाजोल का प्रतिरोध नगण्य (एक प्रतिशत) है। जबकि क्लोजेंटेल और आइवरमेक्टिन जैसे कृमिनाशक प्रभावी हैं। वैज्ञानिक डॉ. मुथु शंकर का कहना है कि तीनों कृमिनाशक पर्वतीय क्षेत्र में प्रभावी हैं। कृमिनाशक का प्रयोग करके बकरी को सुरक्षित रखा जा सकता है।
वर्ष में दो बार करें कृमिनाशकों का प्रयोग
हल्द्वानी। परजीवियों की व्यापकता और कृमिनाशक प्रतिरोध की स्थिति के आधार पर वैज्ञानिकों ने वर्ष में दो बार कृमिनाशक का प्रयोग करने की सलाह दी। पहला मध्यम मानसून के मौसम यानी जुलाई की शुरुआत में किसी भी कृमिनाशक का प्रयोग करके और दूसरा सर्दियों की शुरुआत में नवंबर से दिसंबर मध्य तक सिर्फ आइवरमेक्टिन का प्रयोग करके। आइवरमेक्टिन का प्रयोग सर्दियों में करने से पशुओं को जूं और किल्लियों के प्रकोप से भी बचाया जा सकता है।
मानव में भी पाए गए परजीवी
हल्द्वानी। मुक्तेश्वर में मानव के मल के नमूनों की भी जांच की गई, जिसमें एंकाइलोस्टोमा डुओडीनेल, जिआर्डिया और अमीबिया परजीवी पाए गए। यह परजीवी इंसान में दूषित पानी और मिट्टी से जाते हैं। यह अध्ययन सिर्फ आईवीआरआई मुक्तेश्वर के कर्मियों के नमूने को लेकर किया गया।

यह परजीवी भी है पर्वतीय जिलों में है प्रभावी
नेमाटोड परजीवियों के अतिरिक्त उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में ‘सेनुरस सेरेब्रालिस सिस्ट’ का प्रकोप भी है। इससे बकरी के दिमाग में सिस्ट बन जाता है। मस्तिष्क प्रभावित होने के कारण जानवर में गिड (चक्कर लगाकर घूमने की बीमारी) हो जाती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed