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कुविवि फर्जीवाड़े का रैकेट छह माह बाद भी पकड़ से दूर
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नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय में 23 से ज्यादा फर्जी डिग्रियों एवं मार्कशीट के मामले का खुलासा होने के छह महीने बाद भी कोई आरोपी नहीं पकड़ा जा सका है। पुलिस अब तक पता नहीं लगा पाई है कि इतनी बड़ी जालसाजी के पीछे किस गिरोह का हाथ है। पुलिस के पास इस सवाल का भी जवाब नहीं है कि आखिर वह शातिरों का कौन सा रैकेट है जिसने रेबड़ी की तरह एमबीए, एमटेक, बीटेक समेत विभिन्न पाठ्यक्रमों की डिग्रियां और मार्कशीट घर बैठे बनाकर विद्यार्थियों को उपलब्ध करवा दीं। पुलिस चार महीने पहले केस में मुंबई की एक छात्रा का नाम एवं पता ट्रेस कर चुकी है, लेकिन आश्चर्य की बात है कि अब तक एक भी आरोपी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका है। लंबे समय से कोई हलचल न होने के कारण जालसाजी के इस प्रकरण के ठंडे बस्ते में जाने की आशंका पैैदा हो रही है। हालांकि पुलिस का कहना है कि उन्हें कनाडा से विद्यार्थियों का डाटा नहीं मिल पा रहा है। इस कारण केस के खुलासे में देर हो रही है।
दिसंबर 2018 में कुमाऊं विवि के परीक्षा नियंत्रण विभाग ने 23 से ज्यादा फर्जी मार्कशीट व डिग्रियां पकड़ीं थीं। यह खुलासा उस समय हुआ था जब कनाडा की संस्था डब्ल्यूईएस ने दस्तावेजों को सत्यापन के लिए विवि के पास नैनीताल भेजा। फिर कनाडा उच्चायोग से दस्तावेज सत्यापन के लिए आए और वो भी फर्जी निकले। मुंबई की तिलक एजूकेशन सोसायटी से आईं डिग्रियां व मार्कशीट भी जाली साबित हुईं। इसके बाद आशंका पैदा हो गई कि कोई बड़ा रैकेट इस जालसाजी के पीछे है, जिसने फर्जी मार्कशीट व डिग्रियां बनाने का काला कारोबार संचालित कर रखा है। देश के कई अन्य विवि व कॉलेज भी इस फर्जीवाड़े की चपेट में होने की आशंका जताई जाने लगी। कुविवि प्रशासन ने इस फर्जीवाड़े के खुलासे की उम्मीद में मल्लीताल कोतवाली में मुकदमा दर्ज करवा दिया। केस की विवेचना एसआई आशा बिष्ट को मिली। आशा केस की विवेचना कर रहीं थीं कि इसी बीच उनका तबादला भवाली कोतवाली हो गया। ट्रांसफर के बाद भी एसपी क्राइम रचिता जुयाल ने केस की विवेचना आशा बिष्ट के पास ही रखी। चार महीने पहले एसआई मुंबई की एक छात्रा का नाम एवं पता ट्रेस करने में कामयाब रहीं, जिसे लेकर उनकी खूब वाहवाही हुई, लेकिन इसके बाद विवेचना की गति धीमी हो गई। अब चार महीने का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन पुलिस एक भी आरोपी को पकड़ने में कामयाब नहीं हो सकी है।
कुविवि फर्जीवाडे़ का रैकेट छह माह बाद भी पकड़ से दूर
कुमाऊं विश्वविद्यालय में पकड़ीं गईं हैं 23 से ज्यादा फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट
जालसाजों की फ्रॉड कंपनी ने रेबड़ी की तरह बांटीं हैं एमबीए, एमटेक, बीटेक की फर्जी मार्कशीट
कनाडा से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। जिस कारण परेशानी हो रही है। पुलिस जालसाजों तक पहुंचने का लगातार प्रयास कर रही है। -एसआई आशा बिष्ट, केस की विवेचक।
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दिसंबर 2018 में कुमाऊं विवि के परीक्षा नियंत्रण विभाग ने 23 से ज्यादा फर्जी मार्कशीट व डिग्रियां पकड़ीं थीं। यह खुलासा उस समय हुआ था जब कनाडा की संस्था डब्ल्यूईएस ने दस्तावेजों को सत्यापन के लिए विवि के पास नैनीताल भेजा। फिर कनाडा उच्चायोग से दस्तावेज सत्यापन के लिए आए और वो भी फर्जी निकले। मुंबई की तिलक एजूकेशन सोसायटी से आईं डिग्रियां व मार्कशीट भी जाली साबित हुईं। इसके बाद आशंका पैदा हो गई कि कोई बड़ा रैकेट इस जालसाजी के पीछे है, जिसने फर्जी मार्कशीट व डिग्रियां बनाने का काला कारोबार संचालित कर रखा है। देश के कई अन्य विवि व कॉलेज भी इस फर्जीवाड़े की चपेट में होने की आशंका जताई जाने लगी। कुविवि प्रशासन ने इस फर्जीवाड़े के खुलासे की उम्मीद में मल्लीताल कोतवाली में मुकदमा दर्ज करवा दिया। केस की विवेचना एसआई आशा बिष्ट को मिली। आशा केस की विवेचना कर रहीं थीं कि इसी बीच उनका तबादला भवाली कोतवाली हो गया। ट्रांसफर के बाद भी एसपी क्राइम रचिता जुयाल ने केस की विवेचना आशा बिष्ट के पास ही रखी। चार महीने पहले एसआई मुंबई की एक छात्रा का नाम एवं पता ट्रेस करने में कामयाब रहीं, जिसे लेकर उनकी खूब वाहवाही हुई, लेकिन इसके बाद विवेचना की गति धीमी हो गई। अब चार महीने का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन पुलिस एक भी आरोपी को पकड़ने में कामयाब नहीं हो सकी है।
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कुविवि फर्जीवाडे़ का रैकेट छह माह बाद भी पकड़ से दूर
कुमाऊं विश्वविद्यालय में पकड़ीं गईं हैं 23 से ज्यादा फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट
जालसाजों की फ्रॉड कंपनी ने रेबड़ी की तरह बांटीं हैं एमबीए, एमटेक, बीटेक की फर्जी मार्कशीट
कनाडा से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। जिस कारण परेशानी हो रही है। पुलिस जालसाजों तक पहुंचने का लगातार प्रयास कर रही है। -एसआई आशा बिष्ट, केस की विवेचक।
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