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भाई में और किताबों में पिता का वात्सल्य और ममता की छांव ढूंढते अनाथ

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sun, 08 May 2022 12:12 AM IST
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Father's affection in brother and in books and orphans looking for the shade of Mamta
ममता डंगवाल। विज्ञप्ति
हल्द्वानी। कोविड काल ने किसी की मां छीन ली तो किसी के सिर से पिता का साया उठ गया, लेकिन जिंदगी यहीं नहीं रुकती। समाज में कुछ हिम्मती लोग इस सदमे से उबरते हुए आगे बढ़ने पर यकीन रखते हैं। यहां ऐसे दो परिवार हैं जिन्होंने कोविड काल में अपने माता-पिता खो दिए। किसी को बड़े भाई ने माता-पिता का वात्सल्य दिया तो किसी ने किताबों से दोस्ती कर उसे अपना सब कुछ समझ लिया।
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ममता के लिए किताबें बनीं दोस्त
एक साल पहले कोरोना काल के समय दुम्का बंगर बच्ची धर्मा निवासी 21 वर्षीय ममता डंगवाल की माता पार्वती का 14 मई 2021 को कोविड संक्रमण से निधन हो गया था। ममता संभली भी नहीं थी कि तीन दिन बाद ही 16 मई 2021 को पिता कमल सिंह भी कोविड संक्रमण से चल बसे। तब अकेली ममता को गांव के प्रधान और उनके मामा ने सहयोग किया लेकिन मुसीबत इसके बाद भी कम नहीं हुई। कुछ अपरिचित लोग रिश्तेदार बनकर ममता को बेघर करने पहुंच गए। तब प्रधान और गांव वालों ने एकजुटता दिखाई। अमर उजाला ने प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाया और प्रशासन का ध्यान खींचा, जिसके बाद पूरा तंत्र ममता के साथ खड़ा हुआ। घटना को एक साल पूरा हो गया। अकेली ममता ने हिम्मत नहीं हारी और किताबों से दोस्ती कर ली। बीएससी पूरी करने के बाद पेट भरने के लिए खुद अपने लिए एक निजी कंपनी में नौकरी ढूंढ ली। सुबह शाम घर में पढ़ाई कर एसएससी की तैयारी कर रही हैं। ममता बताती हैं कि अब यही मेरे माता-पिता हैं। मुझे बहुत पढ़ना है और कामयाब होना है।
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बड़े भाई हिमांशु निभा रहे महेश के माता-पिता की भूमिका
हल्द्वानी। दुम्का बंगर निवासी 29 वर्षीय महेश चंदोला और 31 वर्षीय हिमांशु चंदोला की कहानी भी दुखद है। पिता का साया बचपन में उठ गया था और मां करीब 10 महीने पहले कोविड संक्रमण से चल बसी। निजी अस्पताल में कोविड के कारण दम तोड़ने के बाद भी दोनों भाइयों को सरकार की ओर से वात्सल्य योजना का लाभ नहीं मिल पाया। पटवारी से सीएमओ के चक्कर काटते हुए महेश को कई महीने बीत गए।
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पिता निजी संस्थान में काम करते थे अब उन्हीं की जगह बड़ा भाई हिमांशु काम करता है और पालीटेक्निक पास महेश भी किसी प्राइवेट कंपनी में काम कर पेट पाल रहे हैं। महेश बताते हैं कि मातृ और पितृ दिवस अब उनके लिए सिर्फ तिथि भर है। पिता के बाद बड़ा भाई ही अब उनके लिए माता-पिता की भूमिका में हैं।
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