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पति की मौत के बाद भी फरहा ने नहीं मानी हार
अमर उजाला ब्यूरो, भीमताल
Updated Tue, 19 Apr 2016 10:40 PM IST
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फरहा खान
- फोटो : अमर उजाला
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आज ही के दिन 14 साल पहले भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान मिग-21 के फाइटर पायलट स्कार्डन लीडर तारिक जमील अहमद खान उस वक्त देश की खातिर शहीद हो गए थे, जब उनका मिग-21 तकनीकी खराबी के चलते असम के जंगल में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। पत्नी फरहा खान पर तो दुखों का पहाड़ टूट गया। बावजूद इसके फरहा ने हार नहीं मानी और खुद को जिंदगी की जंग से लड़ने के लिए तैयार किया। फरहा ने ठान लिया कि पति द्वारा सौंपी गई जुड़वा बच्चों की जिम्मेदारी को वह बखूबी निभाएगी और अपने बेटों को पढ़ा लिखा कर अच्छा इंसान बनाएगी। फरहा की मेहनत रंग लाई।
वर्तमान में उनके दोनों बेटे न्यूजीलैंड में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और फरहा अपने रोजमर्रा के कार्यों को अंजाम देेने के साथ साथ समाजसेवा में जुटी हैं। फरहा के पति खान को मरणोपरांत सराहनीय योगदान और देशसेवा के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम ने विशिष्ट सेवा मैडल से नवाजा गया।
भीमताल-भवाली रोड में गोलूधार में रह रही फरहा ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि भागलपुर के रहने वाले पूर्व डीएम के बेटे उनके पति स्क्वार्डन लीडर खान मिग 21 के निपुर्ण फाइटर पायलट थे। वर्ष 2002 में वह तेजपुर (असम) में स्थित वायु सेना के हवाई अड्डे पर तैनात थे और नए पायलटों को मिग 21 को उड़ाने का प्रशिक्षण देते थे। 20 अप्रैल 2002 को एक फ्लाईंग आफिसर को प्रशिक्षण देते वक्त उनका मिग दुर्घटनाग्रस्त हो गया और फरहा का खुशहाल परिवार एक पल में बिखर गया।
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तब उनके जुड़वा बेटे सात साल के थे। सिर से पति का साया उठने के बावजूद फरहा ने हिम्मत नहीं हारी। वायुसेना की ओर से मिले सहयोग के चलते शुरू के तीन साल वह नैनीताल में रही और इस दौरान उन्होंने कुविवि से पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पूरा किया। माता पिता और भाईयों के अनुरोध के बावजूद फरहा ने अपनी अलग पहचान बनाने की ठानी।
फहरा के पिता नूर मोहम्मद सैनिक स्कूल घोड़ाखाल में वरिष्ठ शिक्षक थे लिहाजा उनकी पढ़ाई सैनिक स्कूल में हुई। सैनिक स्कूल की शिक्षा काम आई। फरहा ने अपने दम पर मकान बनाने के लिए कई जगह जमीन खरीदी लेकिन बाद में उन्होंने गोलूधार में अपने लिए मकान बनवाया। इसी दौरान उन्होंने अपने जुड़वा बच्चों आदिल और साहिल को पहले नैनीताल स्थित सैंट जोजफ और भीमताल स्थित लेक्स इंटरनेशनल स्कूल में शिक्षा दिलाई। इंटरमीडिएट उत्तीर्ण होने के बाद दोनों बच्चों को पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड भेज दिया जहां उनके लाडले बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स कर रहे हैं। फरहा बताती हैं कि हर रोज उनकी बच्चों से बात होती है।
बातचीत के दौरान वह बच्चथों से कहती हैं कि पढ़ाई में होनहार बनने के साथ साथ उन्हें अच्छा इंसान बनना है। एक सवाल के जवाब में फरहा ने कहा कि उन्होंने कभी टूटना नहीं सीखा। वह कहती हैं कि पति की मौत के बाद यदि वह टूट जाती तो बच्चों के भविष्य का क्या होता।
अच्छी गाड़ियां रखना, किताबें पढ़ना, गार्डनिंग करना, घर की सजावट करना और अच्छे व्यंजन तैयार करना फरहा को खूब भाता है। रोजमर्रा के कार्यो से जो समय उन्हें मिलता है उसमें वह अपने शौक पूरे करती हैं। फरहा गोलूधार में आवासीय सोसायटी की अध्यक्षा भी हैं। यही नहीं वह नगर और आसपास के क्षेत्रों में स्थित अनाथालयों में जाकर समाजसेवा भी करती हैं। बेहद विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आप को मजबूत रखकर फरहा ने जो कर दिखाया ऐसा शायद कम ही लोग कर पाएं।
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वर्तमान में उनके दोनों बेटे न्यूजीलैंड में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और फरहा अपने रोजमर्रा के कार्यों को अंजाम देेने के साथ साथ समाजसेवा में जुटी हैं। फरहा के पति खान को मरणोपरांत सराहनीय योगदान और देशसेवा के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम ने विशिष्ट सेवा मैडल से नवाजा गया।
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भीमताल-भवाली रोड में गोलूधार में रह रही फरहा ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि भागलपुर के रहने वाले पूर्व डीएम के बेटे उनके पति स्क्वार्डन लीडर खान मिग 21 के निपुर्ण फाइटर पायलट थे। वर्ष 2002 में वह तेजपुर (असम) में स्थित वायु सेना के हवाई अड्डे पर तैनात थे और नए पायलटों को मिग 21 को उड़ाने का प्रशिक्षण देते थे। 20 अप्रैल 2002 को एक फ्लाईंग आफिसर को प्रशिक्षण देते वक्त उनका मिग दुर्घटनाग्रस्त हो गया और फरहा का खुशहाल परिवार एक पल में बिखर गया।
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तब उनके जुड़वा बेटे सात साल के थे। सिर से पति का साया उठने के बावजूद फरहा ने हिम्मत नहीं हारी। वायुसेना की ओर से मिले सहयोग के चलते शुरू के तीन साल वह नैनीताल में रही और इस दौरान उन्होंने कुविवि से पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पूरा किया। माता पिता और भाईयों के अनुरोध के बावजूद फरहा ने अपनी अलग पहचान बनाने की ठानी।
फहरा के पिता नूर मोहम्मद सैनिक स्कूल घोड़ाखाल में वरिष्ठ शिक्षक थे लिहाजा उनकी पढ़ाई सैनिक स्कूल में हुई। सैनिक स्कूल की शिक्षा काम आई। फरहा ने अपने दम पर मकान बनाने के लिए कई जगह जमीन खरीदी लेकिन बाद में उन्होंने गोलूधार में अपने लिए मकान बनवाया। इसी दौरान उन्होंने अपने जुड़वा बच्चों आदिल और साहिल को पहले नैनीताल स्थित सैंट जोजफ और भीमताल स्थित लेक्स इंटरनेशनल स्कूल में शिक्षा दिलाई। इंटरमीडिएट उत्तीर्ण होने के बाद दोनों बच्चों को पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड भेज दिया जहां उनके लाडले बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स कर रहे हैं। फरहा बताती हैं कि हर रोज उनकी बच्चों से बात होती है।
बातचीत के दौरान वह बच्चथों से कहती हैं कि पढ़ाई में होनहार बनने के साथ साथ उन्हें अच्छा इंसान बनना है। एक सवाल के जवाब में फरहा ने कहा कि उन्होंने कभी टूटना नहीं सीखा। वह कहती हैं कि पति की मौत के बाद यदि वह टूट जाती तो बच्चों के भविष्य का क्या होता।
अच्छी गाड़ियां रखना, किताबें पढ़ना, गार्डनिंग करना, घर की सजावट करना और अच्छे व्यंजन तैयार करना फरहा को खूब भाता है। रोजमर्रा के कार्यो से जो समय उन्हें मिलता है उसमें वह अपने शौक पूरे करती हैं। फरहा गोलूधार में आवासीय सोसायटी की अध्यक्षा भी हैं। यही नहीं वह नगर और आसपास के क्षेत्रों में स्थित अनाथालयों में जाकर समाजसेवा भी करती हैं। बेहद विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आप को मजबूत रखकर फरहा ने जो कर दिखाया ऐसा शायद कम ही लोग कर पाएं।