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..इंसान के मरने के बाद भी जिंदा रहते हैं उसके रिश्ते
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नैनीताल। अनुकृति रंगमंडल कानपुर, युगमंच, मधुबन आर्ट्स की ओर से नगर के शैले हॉल में आजादी के अमृत महोत्सव के तहत तीसरे दिन संबोधन और नि:शब्द नाटक का मंचन किया गया। संबोधन नाट्य संवाद में लोगों की आंखें भर आई। नि:शब्द ने मानवीय संवेदनाएं जगा दीं, जिसमें कलाकारों ने यादगार अभिनय किया।
नाट्य समारोह में नि:शब्द नाटक में दिखाया गया कि मानवीय रिश्तों का महज संबोधन में बंध जाना दुर्भाग्य है। नाटक में बीस वर्ष की एक बेटी अपने पिता को न सिर्फ तलाशती है बल्कि उसके मन में झांकना भी चाहती हैं कि ऐसी क्या वजह रही होगी जिसके चलते बीस वर्ष पहले उसके पिता ने उसकी मां को छोड़ दिया था। पिता से किए सवालों में वह उन जवाबों को पा जाती है, जिसे उसकी ने मां सारे संबोधनों में जीवन भर तलाशा।
नाटक में शुभी मेहरोत्रा ने पत्नी, श्रद्धा, आरती ने बेटी, दीपक राज राही ने पति की भूमिका निभाई। लेखक सुनील राज के इस नाटक का निर्देशन डॉ. ओमेंद्र कुमार ने किया।
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निशब्द की प्रस्तुति ने मानवीय संवेदनाएं जगा दीं। नाटक में अजय साहनी की भूमिका शैलेंद्र अग्रवाल, गार्गी की भूमिका आरती शुक्ला ने निभाई। नाटक में दोनों दिल्ली-एनसीआर के एक अपार्टमेंट में रहते हैं। अजय साहनी को रिटायर हुए करीब दस साल हो चुके हैं। उनकी लड़की कुक्कू पति के साथ बेंगलूरू में रहती है। अजय और गार्गी प्राइवेट हॉस्पिटल से कोरोना का पहला डोज लगवा कर अपने घर आते हैं।
अजय को थोड़ा बुखार महसूस होता है। टेस्ट रिजल्ट में अजय निगेटिव जबकि गार्गी पॉजिटिव निकलती हैं। नाटक में बीमारी पर आक्सीजन न मिलने के दर्द को बखूबी दिखाया गया है। मृत्यु के बाद भी श्मशान घाट में दिक्कत को दिखाया गया।
मुख्य भूमिकाओं में शैलेंद्र, आरती के अलावा संध्या सिंह, शिवेंद्र त्रिवेदी, दिलीप सिंह सेंगर ने जीवंत अभिनय किया। लेखक राजेश कुमार के नाटक का निर्देशन एवं प्रकाश संचालन कृष्णा सक्सेना ने किया।
इस मौके पर वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम, डॉ. मोहित सनवाल, नवीन बेगाना, नरेंद्र सिंह, मिथलेश पांडेय, अनुकृति कानपुर की जौली घोष, सुरेश श्रीवास्तव, विजयभान सिंह मौजूद रहे।
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नाट्य समारोह में नि:शब्द नाटक में दिखाया गया कि मानवीय रिश्तों का महज संबोधन में बंध जाना दुर्भाग्य है। नाटक में बीस वर्ष की एक बेटी अपने पिता को न सिर्फ तलाशती है बल्कि उसके मन में झांकना भी चाहती हैं कि ऐसी क्या वजह रही होगी जिसके चलते बीस वर्ष पहले उसके पिता ने उसकी मां को छोड़ दिया था। पिता से किए सवालों में वह उन जवाबों को पा जाती है, जिसे उसकी ने मां सारे संबोधनों में जीवन भर तलाशा।
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नाटक में शुभी मेहरोत्रा ने पत्नी, श्रद्धा, आरती ने बेटी, दीपक राज राही ने पति की भूमिका निभाई। लेखक सुनील राज के इस नाटक का निर्देशन डॉ. ओमेंद्र कुमार ने किया।
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निशब्द की प्रस्तुति ने मानवीय संवेदनाएं जगा दीं। नाटक में अजय साहनी की भूमिका शैलेंद्र अग्रवाल, गार्गी की भूमिका आरती शुक्ला ने निभाई। नाटक में दोनों दिल्ली-एनसीआर के एक अपार्टमेंट में रहते हैं। अजय साहनी को रिटायर हुए करीब दस साल हो चुके हैं। उनकी लड़की कुक्कू पति के साथ बेंगलूरू में रहती है। अजय और गार्गी प्राइवेट हॉस्पिटल से कोरोना का पहला डोज लगवा कर अपने घर आते हैं।
अजय को थोड़ा बुखार महसूस होता है। टेस्ट रिजल्ट में अजय निगेटिव जबकि गार्गी पॉजिटिव निकलती हैं। नाटक में बीमारी पर आक्सीजन न मिलने के दर्द को बखूबी दिखाया गया है। मृत्यु के बाद भी श्मशान घाट में दिक्कत को दिखाया गया।
मुख्य भूमिकाओं में शैलेंद्र, आरती के अलावा संध्या सिंह, शिवेंद्र त्रिवेदी, दिलीप सिंह सेंगर ने जीवंत अभिनय किया। लेखक राजेश कुमार के नाटक का निर्देशन एवं प्रकाश संचालन कृष्णा सक्सेना ने किया।
इस मौके पर वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम, डॉ. मोहित सनवाल, नवीन बेगाना, नरेंद्र सिंह, मिथलेश पांडेय, अनुकृति कानपुर की जौली घोष, सुरेश श्रीवास्तव, विजयभान सिंह मौजूद रहे।