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67 साल बाद फिर इंग्लैंड से छोटी हल्द्वानी पहुंची गन

Sun, 03 Apr 2016 10:13 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, रामनगर
अमर उजाला ब्यूरो, रामनगर Updated Sun, 03 Apr 2016 10:13 PM IST
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England younger than 67 years later arrived at Haldwani Gun
बंदूक - फोटो : अमर उजाला
 जिम कार्बेट ने जिस बंदूक से चंपावत की नरभक्षी बाघिन का शिकार किया था, वह 67 वर्ष बाद रविवार को दोबारा उनके (कार्बेट के) बसाए गांव छोटी हल्द्वानी पहुंची। कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक समीर सिन्हा ने बताया कि पार्क प्रशासन के आग्रह पर मार्क न्यूटन इंग्लैंड से इसे लेकर यहां आए हैं। सोमवार को नगरपालिका रामनगर के ऑडिटोरियम में इस बंदूक के दीदार होंगे। वहीं इस बंदूक को लाने वाले इंग्लैंड की शस्त्र निर्माता कंपनी जोन रिग्बी एंड संस के मालिक मार्क न्यूटन और साइमन का स्वागत किया जाएगा।
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1907 में चंपावत में नरभक्षी बाघिन 436 लोगों को मार चुकी थी। यह संख्या विश्व में सबसे अधिक है। जिम कार्बेट ने इसी बंदूक से उस बाघिन को मारकर कुमाऊं की जनता को आतंक से मुक्ति दिलाई थी। तब यह बंदूक सरकारी थी। नरभक्षी बाघिन का शिकार करने पर तत्कालीन संयुक्त प्रांत (यूपी) के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जॉन ह्यूवट ने कार्बेट को यह बंदूक उपहार में दे दी थी। इसका उल्लेख कार्बेट ने अपनी पुस्तक में भी किया है।
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1947 में भारत छोड़ने के दौरान कार्बेट इस गन को इंग्लैंड की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (ओयूपी) को सौंप गए थे। साथ में एक पत्र भी सौंपा था जिसमें लिखा था ‘इस बंदूक को वह अपने जान से ज्यादा चाहते हैं, जिसने कई बार मुश्किल समय में उनकी जान बचाई थी।’ कुछ समय बाद बंदूक का लाइसेंस निरस्त होने के बाद पुलिस ने इसे जब्त कर लिया था, जिसे इंग्लैंड की शस्त्र निर्माता कंपनी जोन रिग्बी एंड संस के मालिक मार्क न्यूटन और साइमन ने जुर्माना देकर छुड़ा लिया।
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उन्होंने कार्बेट की इस ऐतिहासिक धरोहर को संजोकर रखा। इस बंदूक को लेकर वह रविवार को छोटी हल्द्वानी पहुंचे। उन्होंने बताया कि इस गन को भारत लाने का मुख्य उद्देश्य कार्बेट द्वारा भारत में किए गए कार्यों के प्रति लोगों को जागरूक करना है। बंदूक से होने वाली आय से वह भारत में पर्यावरण और जंगली जानवरों की सुरक्षा में खर्च करेंगे। इस दुर्लभ बंदूक को देखकर लोग स्वयं को भी धन्य मान रहे थे।


अचूक निशानेबाज थे कार्बेट
रामनगर। जिम कार्बेट अचूक निशानेबाज थे। वह बाघों की आवाज निकालकर उनको अपने पास बुला लेते थे। उन्होंने मचान बनाए और हांका लगाए बिना ही सौ से अधिक बाघों का शिकार किया था। 1955 में लंबी बीमारी के बाद केन्या में जिम कार्बेट का निधन हो गया। उनकी स्मृति में ही रामगंगा नेशनल पार्क का नाम बदलकर 1956-57 में जिम कार्बेट नेशनल पार्क रखा गया।
 
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