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फिलहाल बतौर मुख्यमंत्री कार्य नहीं करेंगे रावत
अमर उजाला ब्यूरो, नैनीताल
Updated Tue, 29 Mar 2016 11:52 PM IST
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हाईकोर्ट भवन नैनीताल
- फोटो : अमर उजाला
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हाईकोर्ट के मंगलवार के फैसले के बाद चारों ओर यह चर्चा शुरू हो गई कि जब राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना के बावजूद कोर्ट ने फलोर टेस्ट की अनुमति दे दी है तो इसका अपरोक्ष अर्थ राष्ट्रपति शासन पर रोक भी है। ऐसे में शक्ति परीक्षण होने तक हरीश रावत मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
इस संबंध में विभिन्न अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को स्टे नहीं किया है तथा केवल फलोर टेस्ट के लिए कहा है जिसका अर्थ है कि हरीश रावत राष्ट्रपति शासन लगने के बाद फिलहाल मुख्यमंत्री नहीं हैं। उनका स्टेटस शक्ति परीक्षण के बाद ही तय होगा।
फिलहाल राष्ट्रपति शासन रहेगा जारी
नैनीताल। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने पर रोक संबंधी कोई निर्देश नहीं दिया है। याचिकाकर्ता हरीश रावत के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में यही तर्क भी रखा था कि किसी भी प्रदेश में एक बार राष्ट्रपति शासन लग जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट सहित कोई भी कोर्ट अंतरिम आदेश में राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगा सकता है। कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगाई है ऐसे में यह स्पष्ट है कि फिलहाल राष्ट्रपति शासन जारी रहेगा और सरकार के संबंध में फैसला फलोर टेस्ट का परिणाम हाईकोर्ट में प्रस्तुत किए जाने के बाद ही होगा।
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बागी विधायकों की सदस्यता पर अभी नहीं हुआ फैसला
नैनीताल। हाईकोर्ट के मंगलवार के निर्णय के बाद तमाम लोग यह कयास लगाते रहे कि जब कोर्ट ने बागी विधायकों को भी मतदान का अधिकार दे दिया है तो विधायकों का निलंबन समाप्त माना जाना चाहिए। लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार विधायकों के स्टेटस पर 1 अप्रैल को सुनवाई होनी है अत: यह स्पष्ट है कि उनकी सदस्यता के संबंध में कोई निर्णय नहीं हुआ है साथ ही कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि बागी विधायकों का मतदान प्रथक सील बंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाए। इससे भी यह स्पष्ट है कि अभी कोर्ट भी इन विधायकों को अन्य विधायकों से पृथक मानकर चल रहा है। मतदान के दौरान यदि पार्टियां व्हिप जारी करती हैं और कोई विधायक इसके खिलाफ मतदान करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है।
निर्णय के खिलाफ बुद्घवार को हो सकती है अपील
नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा में 31 मार्च को फलोर टेस्ट के हाईकोर्ट के मंगलवार के निर्देश को बुद्घवार को डबल बैंच के समक्ष चुनौती दिए जाना तय है। दिल्ली से आए विभिन्न पार्टियों से संबंधित वरिष्ठ अधिवक्ता अभी नैनीताल में ही हैं। जानकारों के अनुसार मामले में दोनों की पक्षों की ओर से अपने अपने तर्क है। जहां याचिकाकर्ता हरीश रावत का तर्क दमदार है कि एक ओर राज्यपाल की ओर से उनसे 28 मार्च को शक्ति परीक्षण के लिए कहा गया और उसके ठीक एक दिन पहले प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया वहीं केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं के इस तर्क में भी उतना ही दम है कि राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना के बाद अंतरिम राहत के तौर पर राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगाई जा सकती। हालांकि कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगाई है लेकिन उसके बावजूद फलोर टेस्ट का निर्णय अपरोक्ष रूप से इस पर रोक के रूप में ही देखा जा रहा है। साथ ही केंद्र की यह दलील भी दमदार है कि विधायकों की खरीद फरोख्त संबंधी स्टींग सीडी के सामने आने के बाद स्पष्ट हो गया है कि राज्य में लोकतंत्र की धज्जियां उड गई हैं। ऐसे में राष्ट्रपति शासन आवश्यक था। इन दलीलों से दोनों ही पक्ष अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे तथा यह पहले की तय था कि जिस पक्ष की जीत होगी उसके खिलाफ दूसरा पक्ष खंडपीठ के समक्ष जरूर जाएगा। केंद्र सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि याचिका के निर्णय को चुनौती देने पर मंथन जारी है।
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इस संबंध में विभिन्न अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को स्टे नहीं किया है तथा केवल फलोर टेस्ट के लिए कहा है जिसका अर्थ है कि हरीश रावत राष्ट्रपति शासन लगने के बाद फिलहाल मुख्यमंत्री नहीं हैं। उनका स्टेटस शक्ति परीक्षण के बाद ही तय होगा।
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फिलहाल राष्ट्रपति शासन रहेगा जारी
नैनीताल। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने पर रोक संबंधी कोई निर्देश नहीं दिया है। याचिकाकर्ता हरीश रावत के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में यही तर्क भी रखा था कि किसी भी प्रदेश में एक बार राष्ट्रपति शासन लग जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट सहित कोई भी कोर्ट अंतरिम आदेश में राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगा सकता है। कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगाई है ऐसे में यह स्पष्ट है कि फिलहाल राष्ट्रपति शासन जारी रहेगा और सरकार के संबंध में फैसला फलोर टेस्ट का परिणाम हाईकोर्ट में प्रस्तुत किए जाने के बाद ही होगा।
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बागी विधायकों की सदस्यता पर अभी नहीं हुआ फैसला
नैनीताल। हाईकोर्ट के मंगलवार के निर्णय के बाद तमाम लोग यह कयास लगाते रहे कि जब कोर्ट ने बागी विधायकों को भी मतदान का अधिकार दे दिया है तो विधायकों का निलंबन समाप्त माना जाना चाहिए। लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार विधायकों के स्टेटस पर 1 अप्रैल को सुनवाई होनी है अत: यह स्पष्ट है कि उनकी सदस्यता के संबंध में कोई निर्णय नहीं हुआ है साथ ही कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि बागी विधायकों का मतदान प्रथक सील बंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाए। इससे भी यह स्पष्ट है कि अभी कोर्ट भी इन विधायकों को अन्य विधायकों से पृथक मानकर चल रहा है। मतदान के दौरान यदि पार्टियां व्हिप जारी करती हैं और कोई विधायक इसके खिलाफ मतदान करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है।
निर्णय के खिलाफ बुद्घवार को हो सकती है अपील
नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा में 31 मार्च को फलोर टेस्ट के हाईकोर्ट के मंगलवार के निर्देश को बुद्घवार को डबल बैंच के समक्ष चुनौती दिए जाना तय है। दिल्ली से आए विभिन्न पार्टियों से संबंधित वरिष्ठ अधिवक्ता अभी नैनीताल में ही हैं। जानकारों के अनुसार मामले में दोनों की पक्षों की ओर से अपने अपने तर्क है। जहां याचिकाकर्ता हरीश रावत का तर्क दमदार है कि एक ओर राज्यपाल की ओर से उनसे 28 मार्च को शक्ति परीक्षण के लिए कहा गया और उसके ठीक एक दिन पहले प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया वहीं केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं के इस तर्क में भी उतना ही दम है कि राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना के बाद अंतरिम राहत के तौर पर राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगाई जा सकती। हालांकि कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन पर रोक नहीं लगाई है लेकिन उसके बावजूद फलोर टेस्ट का निर्णय अपरोक्ष रूप से इस पर रोक के रूप में ही देखा जा रहा है। साथ ही केंद्र की यह दलील भी दमदार है कि विधायकों की खरीद फरोख्त संबंधी स्टींग सीडी के सामने आने के बाद स्पष्ट हो गया है कि राज्य में लोकतंत्र की धज्जियां उड गई हैं। ऐसे में राष्ट्रपति शासन आवश्यक था। इन दलीलों से दोनों ही पक्ष अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे तथा यह पहले की तय था कि जिस पक्ष की जीत होगी उसके खिलाफ दूसरा पक्ष खंडपीठ के समक्ष जरूर जाएगा। केंद्र सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि याचिका के निर्णय को चुनौती देने पर मंथन जारी है।