{"_id":"61c397fda5269758d044d971","slug":"astronomers-were-successful-in-seeing-the-massive-explosion-in-a-neutron-star-haldwani-news-hld4485077194","type":"story","status":"publish","title_hn":"न्यूट्रॉन तारे में हुए प्रचंड विस्फोट को देखने में सफल रहे खगोल वैज्ञानिक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
न्यूट्रॉन तारे में हुए प्रचंड विस्फोट को देखने में सफल रहे खगोल वैज्ञानिक
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नैनीताल। स्पेन के खगोलीय संस्थान अंडालूसिया शोध संस्थान (आईएए-सीएसआईसी) और एरीज के खगोल वैज्ञानिकों ने न्यूट्ऱॉन तारे के विशाल चुंबकीय चमक में विभिन्न स्पंदनों को उच्च आवृत्ति में पहली बार देखा है। प्रसिद्ध नेचर पत्रिका ने खगोल वैज्ञानिकों की इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को प्रकाशित किया है। खगोल वैज्ञानिक पहली बार उच्चतम ऊर्जा के उन विस्फोटक क्षणों के विभिन्न दोलनों को मापने में कामयाब रहे हैं, जो कम ज्ञात विशाल मैग्नेटार ज्वालाओं को समझने में एक महत्वपूर्ण घटक हैं। यह मैग्नेटार (विस्फोट) पिछले साल 15 अप्रैल 2020 को हुआ था जो एक सेकंड के लगभग दसवें हिस्से तक ही चला लेकिन इससे उत्सर्जित ऊर्जा सूरज द्वारा एक लाख वर्षों में विकिरित ऊर्जा के बराबर थी। इन प्रेक्षणों ने कई स्पंदनों का खुलासा किया। पहला स्पंदन लगभग एक सेकेंड के लाखवें हिस्से के बराबर था, जो अन्य ज्ञात चरम विस्फोटों की तुलना में अत्यधिक तेज था।
इस उपलब्धि को प्राप्त करने वाले खगोल वैज्ञानिकों की टीम में शामिल आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशि भूषण पांडेय ने बताया कि इस शोध कार्य का नेतृत्व प्रो. अल्बर्टो जे. कास्त्रो-तिराडो ने किया। प्रो. तिराडो के हवाले से पांडेय कहते हैं कि निष्क्रिय अवस्था में भी मैग्नेटार हमारे सूर्य की तुलना में एक लाख गुना अधिक चमकदार हो सकते हैं।
उन्होंने बताया कि यह माना जाता है कि मैग्नेटार में विस्फोट उनके चुंबकीय मंडल में अस्थिरता के कारण हो सकता है या उनकी ऊपरी तह जो करीब एक किमी मोटी एक कठोर और लोचदार परत में उत्पन्न एक प्रकार के भूकंप के कारण हो सकता है।
विज्ञापन
प्रो. पांडेय के मुताबिक बिना किसी उत्प्रेरण के मैग्नेटार तारे के चुंबकीय मंडल में एक प्रकार की तरंगें बनती हैं, जिसे अल्फवेन तरंगें कहते हैं। अल्फेन तरंगें सूर्य के अध्ययन सें भलीभांति ज्ञात है, जो चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के आधार पर दाबांतर के कारण निश्चित बिंदुओं के बीच आगे और पीछे डोलकर पारस्परिक अंतक्रिया कर अपनी ऊर्जा नष्ट करती हैं। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर स्थित असीम (एएसआईएम) नामक उपकरण से इस विस्फोट का पता लगाया गया। बताया कि मात्र एक सेकंड के डेटा के विश्लेषण में एक साल से अधिक का समय लगा और खगोल वैज्ञानिकों की यह टीम इस घटना की लौकिक संरचना को हल कर पाई। खगोल वैज्ञानिकों की इस टीम में वरिष्ठ सदस्य जेवियर पास्कुअल (आईएए- सीएसआईसी, स्पेन) और बार्गेन विवि, नार्वे के शोधकर्ता डॉ. ओस्टगार्ड समेत कई वैज्ञानिक शामिल रहे।
चुंबकीय तनाव को समझने में महत्वपूर्ण घटक साबित होगा
नैनीताल। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ वैज्ञानिक और इस वैज्ञानिक शोधपत्र के सह लेखक डॉ. शशि भूषण पांडेय का कहना है कि यह अध्ययन न्यूट्रॉन तारों और उसके आसपास चुंबकीय तनाव को समझने में महत्वपूर्ण घटक साबित होगा। उन्होंने बताया कि भविष्य में आसपास की आकाश गंगाओं में मैग्नेटार तारों की निरंतर निगरानी से इस घटना को समझने में और अधिक मदद मिलेगी, जो तीव्र रेडियो विस्फोटों के बारे में और अधिक जानने का मार्ग प्रशस्त करेंगी। उन्होंने बताया कि यह अब तक के खगोल विज्ञान में सबसे गूढ़ घटनाओं में से एक है। यह भी कहा कि इससे खगोलीय पिंडों के बारे में अभी भी अल्पज्ञात विशाल चुंबकीय ज्वालाओं को समझना भी संभव हो सकेगा।
विस्फोट के बाद 3.5 मिली सेकेंड में गायब हो गए मैग्नेटार
नैनीताल। एरीज के खगोल वैज्ञानिक प्रो. शशि भूषण पांडेय के मुताबिक विस्फोट के दौरान मिले दोलन अल्फवेन तरंगों के बीच परस्पर क्रिया के द्वारा उत्पन्न उत्सर्जन के अनुरूप होते हैं, जिनकी ऊपरी तह तेजी से अवशोषित होती है। जिस कारण कुछ मिली सेकंड (एक सेकेंड के हजारवें हिस्से) में चुंबकीय पुन: संयोजन प्रक्रिया खत्म हो जाती है। बताया कि इस जीआरबी 200415 (मैग्नेटार) में भी स्पंदनों का पता लगा, जो मुख्य विस्फोट के बाद लगभग 3.5 मिली सेकंड में गायब हो गए। बताया कि इस घटना के वैज्ञानिक विश्लेषण से यह अनुमान लगाना संभव हुआ है कि मैग्नेटार चमक के समय आयतन न्यूट्रान तारे के समान या उससे भी अधिक था।
विज्ञापन
इस उपलब्धि को प्राप्त करने वाले खगोल वैज्ञानिकों की टीम में शामिल आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशि भूषण पांडेय ने बताया कि इस शोध कार्य का नेतृत्व प्रो. अल्बर्टो जे. कास्त्रो-तिराडो ने किया। प्रो. तिराडो के हवाले से पांडेय कहते हैं कि निष्क्रिय अवस्था में भी मैग्नेटार हमारे सूर्य की तुलना में एक लाख गुना अधिक चमकदार हो सकते हैं।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि यह माना जाता है कि मैग्नेटार में विस्फोट उनके चुंबकीय मंडल में अस्थिरता के कारण हो सकता है या उनकी ऊपरी तह जो करीब एक किमी मोटी एक कठोर और लोचदार परत में उत्पन्न एक प्रकार के भूकंप के कारण हो सकता है।
विज्ञापन
प्रो. पांडेय के मुताबिक बिना किसी उत्प्रेरण के मैग्नेटार तारे के चुंबकीय मंडल में एक प्रकार की तरंगें बनती हैं, जिसे अल्फवेन तरंगें कहते हैं। अल्फेन तरंगें सूर्य के अध्ययन सें भलीभांति ज्ञात है, जो चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के आधार पर दाबांतर के कारण निश्चित बिंदुओं के बीच आगे और पीछे डोलकर पारस्परिक अंतक्रिया कर अपनी ऊर्जा नष्ट करती हैं। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर स्थित असीम (एएसआईएम) नामक उपकरण से इस विस्फोट का पता लगाया गया। बताया कि मात्र एक सेकंड के डेटा के विश्लेषण में एक साल से अधिक का समय लगा और खगोल वैज्ञानिकों की यह टीम इस घटना की लौकिक संरचना को हल कर पाई। खगोल वैज्ञानिकों की इस टीम में वरिष्ठ सदस्य जेवियर पास्कुअल (आईएए- सीएसआईसी, स्पेन) और बार्गेन विवि, नार्वे के शोधकर्ता डॉ. ओस्टगार्ड समेत कई वैज्ञानिक शामिल रहे।
चुंबकीय तनाव को समझने में महत्वपूर्ण घटक साबित होगा
नैनीताल। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ वैज्ञानिक और इस वैज्ञानिक शोधपत्र के सह लेखक डॉ. शशि भूषण पांडेय का कहना है कि यह अध्ययन न्यूट्रॉन तारों और उसके आसपास चुंबकीय तनाव को समझने में महत्वपूर्ण घटक साबित होगा। उन्होंने बताया कि भविष्य में आसपास की आकाश गंगाओं में मैग्नेटार तारों की निरंतर निगरानी से इस घटना को समझने में और अधिक मदद मिलेगी, जो तीव्र रेडियो विस्फोटों के बारे में और अधिक जानने का मार्ग प्रशस्त करेंगी। उन्होंने बताया कि यह अब तक के खगोल विज्ञान में सबसे गूढ़ घटनाओं में से एक है। यह भी कहा कि इससे खगोलीय पिंडों के बारे में अभी भी अल्पज्ञात विशाल चुंबकीय ज्वालाओं को समझना भी संभव हो सकेगा।
विस्फोट के बाद 3.5 मिली सेकेंड में गायब हो गए मैग्नेटार
नैनीताल। एरीज के खगोल वैज्ञानिक प्रो. शशि भूषण पांडेय के मुताबिक विस्फोट के दौरान मिले दोलन अल्फवेन तरंगों के बीच परस्पर क्रिया के द्वारा उत्पन्न उत्सर्जन के अनुरूप होते हैं, जिनकी ऊपरी तह तेजी से अवशोषित होती है। जिस कारण कुछ मिली सेकंड (एक सेकेंड के हजारवें हिस्से) में चुंबकीय पुन: संयोजन प्रक्रिया खत्म हो जाती है। बताया कि इस जीआरबी 200415 (मैग्नेटार) में भी स्पंदनों का पता लगा, जो मुख्य विस्फोट के बाद लगभग 3.5 मिली सेकंड में गायब हो गए। बताया कि इस घटना के वैज्ञानिक विश्लेषण से यह अनुमान लगाना संभव हुआ है कि मैग्नेटार चमक के समय आयतन न्यूट्रान तारे के समान या उससे भी अधिक था।