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हिंदी और लोक भाषाओं के संरक्षण पर जोर
अमर उजाला ब्यूरो भीमताल
Updated Wed, 31 Aug 2016 10:49 PM IST
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सम्मेलन को संबोधित करती वरिष्ठ साहित्यकार
- फोटो : अमर उजाला
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वरिष्ठ साहित्यकार किरण अग्रवाल का कहना है कि मौजूदा दौर में हिंदी और उसकी लोक भाषाएं गंभीर संकट में हैं। साहित्य ही नहीं बल्कि बोलचाल की भाषा से भी लोक भाषाएं गायब हो रही हैं। उन्होंने हिंदी के साथ साथ लोक भाषाओं के संरक्षण पर जोर दिया।
रामगढ़ ब्लाक स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में आयोजित दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन के समापन मौके पर बतौर मुख्य अतिथि साहित्यकार अग्रवाल ने हिंदी और उसकी लोक भाषाओं पर मंडरा रहे संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की।
समीक्षक जगमोहन रौतेला ने समय की जटिलता के नाम पर बेवजह के प्रयोग कर रचना को जटिल बनाने पर चिंता जताई। लेखक सुभाष त्रेहन ने बदलते समाज में लोक भाषाओं के लुप्त होने के खतरे का संदेह जताया।
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युवा कथाकार डॉ. अनिल कार्की ने हिंदी और उसकी लोक भाषाओं में युवा रचनाकारों के सामने आने वाली दिक्कतों को प्रमुखता से उठाया। रवाईं लोक भाषा के जानकार महावीर रवल्टा ने उत्तराखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक विसंगति के बारे में बताया।
जौनसारी रचनाकार इंद्र सिंह नेगी ने कहा कि समाज का सबसे संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण साहित्य ही आखिरी आदमी की खबर लेता है। सुरेंद्र पुंडीर ने जौनसारी साहित्य की जानकारी दी।
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए एसजेएस परिसर अल्मोड़ा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. जगत सिंह बिष्ट ने लोक भाषा और लोक बोलियों का प्रयोग करने वाले पाठक और श्रोताओं के गायब होने पर चिंता जताई।
पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने सम्मेलन की सफलता के लिए सभी का आभार जताया। संचालन शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया।
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रामगढ़ ब्लाक स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में आयोजित दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन के समापन मौके पर बतौर मुख्य अतिथि साहित्यकार अग्रवाल ने हिंदी और उसकी लोक भाषाओं पर मंडरा रहे संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की।
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समीक्षक जगमोहन रौतेला ने समय की जटिलता के नाम पर बेवजह के प्रयोग कर रचना को जटिल बनाने पर चिंता जताई। लेखक सुभाष त्रेहन ने बदलते समाज में लोक भाषाओं के लुप्त होने के खतरे का संदेह जताया।
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युवा कथाकार डॉ. अनिल कार्की ने हिंदी और उसकी लोक भाषाओं में युवा रचनाकारों के सामने आने वाली दिक्कतों को प्रमुखता से उठाया। रवाईं लोक भाषा के जानकार महावीर रवल्टा ने उत्तराखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक विसंगति के बारे में बताया।
जौनसारी रचनाकार इंद्र सिंह नेगी ने कहा कि समाज का सबसे संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण साहित्य ही आखिरी आदमी की खबर लेता है। सुरेंद्र पुंडीर ने जौनसारी साहित्य की जानकारी दी।
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए एसजेएस परिसर अल्मोड़ा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. जगत सिंह बिष्ट ने लोक भाषा और लोक बोलियों का प्रयोग करने वाले पाठक और श्रोताओं के गायब होने पर चिंता जताई।
पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने सम्मेलन की सफलता के लिए सभी का आभार जताया। संचालन शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया।