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सिसोंड़ की जैकेट सब को भाई
Updated Sun, 12 Nov 2017 02:26 AM IST
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हल्द्वानी। जोहार महोत्सव में शौका समाज के व्यंजनों और ऊंनी वस्त्रों के स्टाल महोत्सव में आए लोगों को लुभा रहे हैं। जोहार के राजमा, तिमूल की चटनी, मडुवे की रोटी, जंबू, गंद्रैंणी, जड़ी-बूटी, पश्मीना, ऊंनी वस्त्र, दन, थुलमा, चुटका, कालीन आकर्षण का केंद्र बने हैं। खास आकर्षण है सिसोंड़ (बिच्छू घास) की जैकेट।
जनजाति महिलाओं के समूह के उत्पादों को बेचने वाले मुनस्यारी के प्रेम रावत का स्टाल इसलिए लोगों को भा रहा है क्योंकि यहां ेबिच्छू घास और भांग के रेशों से निर्मित जैकेट और वास्कट आए हैं। प्रेम रावत ने बताया कि ये जैकेट चमोली और मुनस्यारी में ही बनते हैं। उनके स्टाल में जड़ी, बूटी, जंब, गंद्रैणी, तिमूर, कुटकी, चिरायत भी हैं। यह जहां सब्जी और दाल में छौंक के काम आती हैं वही डोला और कुटकी पेट समेत कई बीमारियों में कारगर है। वह मंदिर में चढ़ाने वाली चंवर गाय की पूंछ, झांझर, नरैमासी गोकुल धूप आदि भी लाए हैं। प्रयास शोका महिला समिति की तारा पांगती ने बताया कि स्टाल में मडुवे की रोटी, दांगचा (तिमूर की चटनी), कापा (हरी सब्जी), तिमूर की सब्जी, भुमला (चावल), ज्या (उच्च हिमालयी क्षेत्र में खजिया डालकर बनाई जाने वाली नमकीन चाय), हस्तकला स्टाल की ऊषा धर्मशक्तू के स्टाल में सना हुआ चूख (नीबू) है। यहां मांसाहारी व्यंजनों के स्टाल भी लगे हुए हैं। बिल्जू इन स्टाल में भट का डुबका, हरी सब्जी, सैंज (चावल के आटे से बना), पत्यूड़ा (अरबी के पत्तों से बना), गिदक्यू (मडुवे के आटे का सूप) आदि की काफी बिक्री हो रही है। कुमाऊंनी साहित्य समेत कई तरह के साहित्य के किताबों का स्टाल भी लगा है।
ओस्या बसा खस्या
याहं लगे स्टाल लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। स्टाल पर ओस्या बसा खस्या स्लोगन लिखे हैं। ओसा बसा खस्या का अर्थ होता है आओ बैठो और खाओ।
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जनजाति महिलाओं के समूह के उत्पादों को बेचने वाले मुनस्यारी के प्रेम रावत का स्टाल इसलिए लोगों को भा रहा है क्योंकि यहां ेबिच्छू घास और भांग के रेशों से निर्मित जैकेट और वास्कट आए हैं। प्रेम रावत ने बताया कि ये जैकेट चमोली और मुनस्यारी में ही बनते हैं। उनके स्टाल में जड़ी, बूटी, जंब, गंद्रैणी, तिमूर, कुटकी, चिरायत भी हैं। यह जहां सब्जी और दाल में छौंक के काम आती हैं वही डोला और कुटकी पेट समेत कई बीमारियों में कारगर है। वह मंदिर में चढ़ाने वाली चंवर गाय की पूंछ, झांझर, नरैमासी गोकुल धूप आदि भी लाए हैं। प्रयास शोका महिला समिति की तारा पांगती ने बताया कि स्टाल में मडुवे की रोटी, दांगचा (तिमूर की चटनी), कापा (हरी सब्जी), तिमूर की सब्जी, भुमला (चावल), ज्या (उच्च हिमालयी क्षेत्र में खजिया डालकर बनाई जाने वाली नमकीन चाय), हस्तकला स्टाल की ऊषा धर्मशक्तू के स्टाल में सना हुआ चूख (नीबू) है। यहां मांसाहारी व्यंजनों के स्टाल भी लगे हुए हैं। बिल्जू इन स्टाल में भट का डुबका, हरी सब्जी, सैंज (चावल के आटे से बना), पत्यूड़ा (अरबी के पत्तों से बना), गिदक्यू (मडुवे के आटे का सूप) आदि की काफी बिक्री हो रही है। कुमाऊंनी साहित्य समेत कई तरह के साहित्य के किताबों का स्टाल भी लगा है।
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ओस्या बसा खस्या
याहं लगे स्टाल लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। स्टाल पर ओस्या बसा खस्या स्लोगन लिखे हैं। ओसा बसा खस्या का अर्थ होता है आओ बैठो और खाओ।