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अदालत ने पुलिस को तीसरी बार विवेचना के दिए निर्देश
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court order
- फोटो : amar ujala
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हल्द्वानी। बच्चेदानी निकालने और नवजात की मौत के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नैनीताल की अदालत ने पुलिस को तीसरी बार विवेचना करने का आदेश दिया है। अदालत ने तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देने का आदेश दिया है। इस मामले में सुनवाई के लिए 16 सितंबर की तिथि निर्धारित की गई है।
छड़ायल नयाबाद दिव्य रत्न कालोनी निवासी सुनील भट्ट के अनुसार उनकी पत्नी ममता भट्ट को प्रसव पीड़ा होने पर छह जुलाई 2013 की आधी रात के बाद सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डाक्टरों ने आठ जुलाई को ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के दौरान नवजात की मौत हो गई। संक्रमण के चलते महिला की हालत नाजुक हो गई। परिजनों ने तत्कालीन प्राचार्य आरसी पुरोहित से शिकायत की थी कि नौसिखिए डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया इस कारण नवजात की मौत हुई। इसके बाद ममता का दूसरा ऑपरेशन किया गया। डॉक्टरों की टीम ने उनका गर्भाशय निकाल दिया।
इस मामले में परिजनों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। जांच के बाद पुलिस के विवेचक ने अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत कर बताया कि नवजात की धड़कन कम होने के कारण उसे बचाया नहीं जा सका। अधिक रक्त स्राव होने के कारण प्रसूता की बच्चेदानी निकालनी पड़ी। इस मामले में वादी ने आपत्ति जताई। विवेचक अजेंद्र प्रसाद ने जांच आख्या प्रस्तुत कर बताया कि एक्सपर्ट रिपोर्ट में डाक्टरों की लापरवाही नहीं पाई गई है।
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कोर्ट ने पुलिस से कहा, तीसरी बार फिर करो विवेचना
प्रसूता की बच्चेदानी निकालने और नवजात की मौत का मामला
अस्पताल की जांच रिपोर्ट में लापरवाही माना गया था
हल्द्वानी। बताया गया कि अस्पताल की प्रथम जांच रिपोर्ट के सदस्य डॉ. अशोक कुमार ने इस लापरवाही माना था। इस मामले को लेकर विवेचक की भूमिका पर सवाल उठाए गए। वादी ने आरोप लगाया कि अस्पताल प्रशासन ने जानबूझकर चार वर्षों तक विलंब किया ताकि अभियुक्तों को बचाया जा सके। इस मामले में दूसरी जांच कमेटी नौ जुलाई 2013 को गठित की गई। वादी के अधिवक्ता गोपाल सिंह कपकोटी ने तर्क दिया कि विवेचना को मशीनीकृत रूप से संपादित किया गया। विवेचना पर अधिवक्ता ने सवाल खड़े किए। अदालत ने अंतिम रिपोर्ट को निरस्त करने के साथ फिर सक्षम अधिकारी की देखरेख में विवेचना करने का आदेश दिया।
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छड़ायल नयाबाद दिव्य रत्न कालोनी निवासी सुनील भट्ट के अनुसार उनकी पत्नी ममता भट्ट को प्रसव पीड़ा होने पर छह जुलाई 2013 की आधी रात के बाद सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डाक्टरों ने आठ जुलाई को ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के दौरान नवजात की मौत हो गई। संक्रमण के चलते महिला की हालत नाजुक हो गई। परिजनों ने तत्कालीन प्राचार्य आरसी पुरोहित से शिकायत की थी कि नौसिखिए डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया इस कारण नवजात की मौत हुई। इसके बाद ममता का दूसरा ऑपरेशन किया गया। डॉक्टरों की टीम ने उनका गर्भाशय निकाल दिया।
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इस मामले में परिजनों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। जांच के बाद पुलिस के विवेचक ने अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत कर बताया कि नवजात की धड़कन कम होने के कारण उसे बचाया नहीं जा सका। अधिक रक्त स्राव होने के कारण प्रसूता की बच्चेदानी निकालनी पड़ी। इस मामले में वादी ने आपत्ति जताई। विवेचक अजेंद्र प्रसाद ने जांच आख्या प्रस्तुत कर बताया कि एक्सपर्ट रिपोर्ट में डाक्टरों की लापरवाही नहीं पाई गई है।
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प्रसूता की बच्चेदानी निकालने और नवजात की मौत का मामला
अस्पताल की जांच रिपोर्ट में लापरवाही माना गया था
हल्द्वानी। बताया गया कि अस्पताल की प्रथम जांच रिपोर्ट के सदस्य डॉ. अशोक कुमार ने इस लापरवाही माना था। इस मामले को लेकर विवेचक की भूमिका पर सवाल उठाए गए। वादी ने आरोप लगाया कि अस्पताल प्रशासन ने जानबूझकर चार वर्षों तक विलंब किया ताकि अभियुक्तों को बचाया जा सके। इस मामले में दूसरी जांच कमेटी नौ जुलाई 2013 को गठित की गई। वादी के अधिवक्ता गोपाल सिंह कपकोटी ने तर्क दिया कि विवेचना को मशीनीकृत रूप से संपादित किया गया। विवेचना पर अधिवक्ता ने सवाल खड़े किए। अदालत ने अंतिम रिपोर्ट को निरस्त करने के साथ फिर सक्षम अधिकारी की देखरेख में विवेचना करने का आदेश दिया।